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________________ योगबिंदु 229 देवादिवन्दनं सम्यक्, प्रतिक्रमणमेव च / मैत्र्यादिचिन्तनं चैतत्, सत्त्वादिष्वपरे विदुः // 397 // अर्थ : अन्य आचार्य सम्यक् प्रकार से किये गये देव-गुरु वन्दन को, प्रतिक्रमण को और सभी प्राणियों में मैत्र्यादिभाव के चिन्तन को अध्यात्म कहते हैं // 397|| विवेचन : सर्व रागद्वेषादि दोषों से रहित, ऐसे सुदेव - वीतराग परमात्मा को और साधु के 27 और आचार्य के 36 गुणों से युक्त सुगुरु को प्रशस्त भाव से वन्दन-नमस्कार करना, सेवाभक्ति करना, उनकी आज्ञा में रहना, उनकी हर प्रकार से सम्हाल-सुरक्षा का उत्तमभाव मन में रखना तथा सम्यक् प्रतिक्रमण; जिसके लक्षण निम्न है : स्वस्थानाद् यत्पर स्थानं प्रमादस्य वशात् गतः / भूयोऽपि-आगमनं तत्र, प्रतिक्रमणमुच्यते // अर्थ : स्वदशा से प्रमाद, कषाय, मिथ्यात्व के कारण परदशा में चले जाना और सम्यक्ज्ञान से अपनी स्वदशा में व्रत-पच्चखाण आदि में आत्मा को पुनः ले आना प्रतिक्रमण है। Return to home जो मनोवृत्तियां बाहर भटकने के लिये चली गई है, उन्हें पुनः आत्मघर में वापिस लाना। ऐसा वास्तविक प्रतिक्रमण करना, पुनः आत्मा को परदशा में जाने न देना और स्वदशा में स्थिर करना तथा सभी प्राणियों पर मैत्री, प्रमोद, करुणा और मध्यस्थ भावना रखना, ये सब अध्यात्म है, ऐसा अन्य आचार्य भी कहते हैं // 397 / / / स्थानकालक्रमोपेतं, शब्दार्थानुगतं तथा / अन्यासंमोहजनकं, श्रद्धासंवेगसूचकम् // 398 // प्रोल्लसद्भावरोमाञ्चं, वर्धमानशुभाशयम् / अवनामादिसंशुद्धमिष्टं देवादिवन्दनम् // 399 // अर्थ : स्थान, काल और क्रमसहित, शब्दार्थसहित, अन्य को भ्रांति न पैदा करने वाला, श्रद्धा और वैराग्य को अभिव्यक्त करने वाला, भावों को उल्लसित करके, रोमाञ्च पैदा करने वाला, शुभपरिणामों को बढ़ाने वाला, अवनामन यथाजात आदि क्रियाविशेषों से संशुद्ध ऐसा देवादि वन्दन इष्ट है // 398-399 // विवेचन : कैसा देवादिवन्दन अध्यात्मकोटि में आता है ? उसे किस प्रकार करना चाहिये? बताते हैं कि वह देवादिवन्दन स्थान, काल और क्रम सहित होना चाहिये अर्थात् शरीर संस्थान को शास्त्रविहित विधि से यथायोग्य रखकर यानी शास्त्र में चैत्यवन्दन की विधि-किस आसन और किस मुद्रा में बैठकर, चैत्यवन्दनादि करना लिखा है, उसके अनुसार बैठ कर और शास्त्रविहित काल के
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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