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________________ 228 योगबिंदु विवेचन : स्वौचित्यालोचन के पश्चात् साधक जब धर्म में प्रवृत्ति करता है, तो उसे डर रहता है कि कहीं पूर्वकृत पापकर्म के उदय से, शुरु किये हुये मेरे धर्मकार्यों में किसी प्रकार का विघ्न न आ जाये, क्योंकि विघ्न आने से भंगादि और अतिचार आदि दोष मुझे लगेंगे / इस प्रकार उसकी आत्मा पाप से डरती है। उन विघ्नों की शान्ति के लिये साधक को आत्म स्वरूप का निरीक्षण करना-मुझे क्या करना चाहिये ? कैसे करना चाहिये ? क्या त्यागना और क्या ग्रहण करना चाहिये? आदि में आत्मा की शक्ति-वीर्य का विचार करना, विघ्नशान्ति का लक्ष्य रखना भी अध्यात्म-योग कहा जाता है / क्योंकि वह प्राप्त हुये धर्म की रक्षा की प्रवृत्ति करवाता है // 394 // विस्रोतोगमने न्याय्यं, भयादौ शरणादिवत् / / गुर्वाद्याश्रयणं सम्यक्, ततः स्याद् दुरितक्षयः // 395 // अर्थ : उन्मार्ग गमन का भय उपस्थित होने पर, न्याययुक्त यही है कि (वह) शरणादि की भांति गुरु आदि का आश्रय सम्यक् प्रकार से ग्रहण करे उससे दुरित-पाप (दुर्गति) का क्षय होता है // 395 // विवेचन : साधक की चित्तवृत्ति यदि उन्मार्गगामी हो जाय और आत्मपतन का भय उपस्थित हो जाय, तब कहते हैं कि न्याययुक्त यही है कि वह गीतार्थ गुरु की शरण में आ जाय। जैसे पर-राज्य का भय उपस्थित होने पर कोट, किला, दुर्ग उसकी रक्षा के लिये होता है / रोग के लिये चिकित्सा, भूतग्रहपीड़ा आदि के लिये मंत्र का शरण, योग्य और आवश्यक है। इसी प्रकार आत्मपतन का प्रसंग उपस्थित होने पर महागीतार्थ गुरुओं की - धार्मिक पुरुषों की शरण ग्रहण करना चाहिये / क्योंकि उनके बताये मार्ग पर चलने से महान् लाभ प्राप्त होता है; पापसमूह सब नष्ट हो जाते है / उन्मार्ग प्रवृत्ति जिस पाप कर्मोदय से हुई हो वह भी नष्ट हो जाती है, समाप्त हो जाती है। देवगुरु और धर्म की अचिन्त्यशक्ति है ऐसी दृढ़ श्रद्धायुक्त भावना और प्रवृत्ति को भी अध्यात्मयोग कहते हैं // 395|| सर्वमेवेदमध्यात्म, कुशलाशयभावतः / औचित्याद् यत्र नियमालक्षणं यत् पुरोदितम् // 396 // अर्थ : औचित्यालोचनादि का जो निश्चित स्वरूप पूर्व में बता चुके हैं, कुशल-प्रशस्त आशय होने से वे सब अध्यात्मयोग है // 396 / / विवेचन : प्रशस्तचित्त और प्रशस्त भावना से किये गये सभी अनुष्ठान, अध्यात्मयोग में समा जाते हैं पूर्व में हमने जो औचित्यालोचन, धर्म प्रवृत्ति आदि का निश्चित स्वरूप बताया है उसमें भी प्रशस्तभावना की प्रधानता है, भाव प्रधान होने से ये भी सभी अध्यात्म में ही समाविष्ट हो जाते हैं // 396||
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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