________________ योगबिंदु 227 उपश्रुति कहते हैं, उनके निमित्तों का विचार करके, भावी शुभाशुभ का निश्चय करना / इस प्रकार योग, जनवाद और लिंग ये तीनों चीजें विचारणीय हैं / इन तीनों की उचित प्रवृत्ति अपनी योग्यता का विचार करके, विवेकपूर्वक करनी चाहिये, तभी योग्य लाभ हो सकता है // 391 // एकान्तफलदं ज्ञेयमतो धर्मप्रवर्तनम् / अत्यन्तं भावसारत्वात् तत्रैवप्रतिबन्धतः // 392 // अर्थ : इससे (स्वौचित्यालोचन के पश्चात्) निश्चय ही धर्म की प्रवृत्ति अत्यन्त भाव प्रधान होने से फलदायक सिद्ध होती है, क्योंकि वहाँ प्रतिबंध का अभाव है // 392 / / विवेचन : अपनी शक्ति को माप लेने के पश्चात् उचितप्रवृत्ति पूर्वक जो धर्मानुष्ठान आदि किये जाते हैं, वे हृदय की उच्च भावना से युक्त होते हैं / भावपूर्ण हृदय से की गई धर्मप्रवृत्ति अवश्यमेव इष्टफल को देती है, क्योंकि जहाँ भाव की प्रधानता है वहाँ कोई भी अन्तराय-प्रतिबंध टिक नहीं सकता / भावना का महत्त्वपूर्ण स्थान है, उसके बिना किया जाने वाला अनुष्ठान, नमक रहित भोजन जैसा हो जाता हैं // 392|| तद्भङ्गादिभयोपेतस्तत्सिद्धौ चोत्सुको दृढम् / / यो धीमानिति सत्र्यायात्, स यदौचित्यमीक्षते // 393 // अर्थ : उस (धर्म प्रवृति) का भंग न हो जाय, ऐसे भय से युक्त और उस (धर्म प्रवृति) की सिद्धि के लिये अत्यन्त उत्सुक, जो बुद्धिमान साधक, न्याययुक्त सन्याय से (धर्मप्रवृत्ति) करता है, वह औचित्य को देखता है // 393|| विवेचन : योग साधक सतत सावधान रहता है कि कहीं योग सम्बन्धी जो धर्म प्रवृत्ति चलती है, सम्यक्दर्शन, ज्ञान और चारित्रमय यम, नियम, तप, जप, ध्यानादि उसमें जरा भी, कभी कोई नियम टूट न जाय; वीर्याचार का भी कोई अतिचार दोष न लग जाये / इस प्रकार पापभीरु साधक सतत अप्रमत्त रहकर, उपयोग पूर्वक सभी धर्म प्रवृत्ति करता है और उसकी सिद्धि के लिये सदा उत्सुक रहता है, कि कब योगमार्ग में मैं पूर्ण बनूंगा? कब मुझे सिद्धि पूर्णता प्राप्त होगी ? इस प्रकार की सतत आतुरता-उत्सुकता जिसके हृदय में है ऐसा श्रीमान-बुद्धिमान ही वस्तुतः न्याय से योगधर्म का अधिकारी जानना चाहिये / क्योंकि बुद्धिमान ही उचितप्रवृत्तिरूप अपने कर्तव्य को समझ सकता है। पापभीरु और सिद्धि उत्सुक योगी ही औचित्य की रक्षा करने में समर्थ हो सकता है // 393 / / आत्मसंप्रेक्षणं चैव ज्ञेयमारब्धकर्मणि / पापकर्मोदयादत्र, भयं तदुपशान्तये // 394 // अर्थ : प्रारम्भ की गई धर्म प्रवृत्ति में पापकर्म के उदय से, उसमें (भंगादि की) जो भीति है, उसे शान्त करने के लिये आत्मसंप्रेक्षण, आत्मनिरीक्षण करना चाहिये // 39 //