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________________ योगबिंदु 223 विवेचन : महापुरुषों ने जाप के लिये कितने सुन्दर स्थलों का निर्देश किया है, क्योंकि व्यक्ति की मानसिक स्थिरता के लिये स्थल और वातावरण महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं / उन्होंने कहा है कि जिसकी मूर्ति सात्त्विक, सौम्य, आल्हादक हो तथा प्रेम और शान्ति प्रदान करे; न कि भय पैदा करें ऐसे सात्विकगुण वाले वीतरागदेव के मन्दिर में, उनकी प्रशान्तमुद्रा के सम्मुख बैठकर, जप करना चाहिये अथवा निर्मल नदी या सरोवर के किनारे बैठकर करना चाहिये / (दूसरा स्थान नदी का निर्मल तट बताया है)। श्री वाचक यशोविजयजी ने सरस्वती का एक करोड़ जाप गंगा किनारे बैठकर किया था और देवता को प्रसन्न किया था / अकलुषित मन से सभी प्रकार के विषय कषायों को दूर करके, शुद्ध मन से जाप करना चाहिये और फिर उपवन, उद्यान, बगीचे जहाँ प्रचुरमात्रा में वृक्ष, पेड़ और लताकुञ्ज हो वही बैठकर, जाप करना चाहिये / ग्रंथकर्ता ने साथ में अकलुषित आत्मा शब्द इसलिये दिया है कि जितना महत्त्व बाह्य शुद्ध वातावरण का है उससे भी अधिक आत्मा की उज्जवलता का है, दोनों परस्पर उपकारक हैं ||383|| पर्वोपलक्षितो यद् वा, पुत्रंजीवकमालया / नासाग्रस्थितया दृष्ट्या, प्रशान्तेनान्तरात्मना // 384 // अर्थ : अंगुलियों के पर्वो से अथवा रुद्राक्षमाला से नासाग्र दृष्टि स्थिर करके, प्रशान्त चित्त से (जाप करना चाहिये) // 384|| विवेचन : पर्वोपलक्षित जाप-अंगुलियों के पर्वो का प्रदक्षिणा पूर्वक नों बार जाप करने से 108 जाप होता है / तात्पर्य यह है कि चाहे अंगुलियों के पर्यों से या रुद्राक्षमाला से, नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि को स्थिर करके, प्रसन्न और प्रशमभाव से पूर्ण प्रशान्त चित्त से जाप करना चाहिये / रुद्राक्षमाला को पुत्रंजीवक नाम से सम्बोधित किया है / रुद्राक्ष नामक वनस्पति के फल की माला को रुद्राक्षमाला कहते हैं / वैष्णवों में इसका अधिक प्रचलन है / शायद श्रीहरिभद्रसूरिजी को अपना पारम्परिक नाम याद रहा होगा / रुद्राक्षमाला शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक रोगों को दूर करने की शक्ति रखती है अतः इसका बहुत बडा महत्त्व है // 384 // विधाने चेतसो वृत्तिस्तद्वर्णेषु तथेष्यते / अर्थे चालम्बने चैव, त्यागश्चोपप्लवे सति // 385 // अर्थ : जप करते समय मंत्र के वर्गों पर, अर्थ पर और आलम्बन पर (प्रतिमादि पर) मन की वृत्ति को स्थिर करना चाहिये, चित्त चंचल होने पर उसका त्याग करना चाहिये // 385|| विवेचन : जप करते समय मन्त्र के अक्षरों पर और अर्थ पर, मन की वृत्ति ऐसी स्थिर
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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