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________________ 216 योगबिंदु अर्थ : सकृदावर्तन करने वालों का योग अतात्त्विक कहा है (क्योंकि) वैसे वेशादिमात्र से प्रायः अनर्थफल ही होता है // 370 // विवेचन : ग्रंथकर्ता का सकृत और आदि शब्द से द्वि-त्रि आर्वतन ग्रहण करने का तात्पर्य यह मालुम होता है कि जीव उपशम श्रेणी से विकास करता हुआ गुणस्थान पर्यन्त पहुंचता है। परन्तु उसके विषय और कषाय मूल से नष्ट नहीं होते, जल में कचरे की भांति केवल उपशान्त हो जाते हैं / इसीलिये ऐसा व्यक्ति उपशम श्रेणी से ग्यारहवें गुणस्थान जैसी शुभ उच्चस्थिति में पहुंचने पर भी नीचे गिरता है, पतित होता है / कोई एक बार गिरता है, कोई दो बार, कोई तीन बार गिरता है। ग्रंथकर्ता इन व्यक्तियों को ही लक्ष्य में लेकर कहते हैं कि इन जीवों का योग अतात्त्विक होता है। क्योंकि वे पुण्य से प्राप्त होने वाले बाह्य भौतिक भोगों के सुखों की लालसा से, देखा-देखी, श्रद्धा बिना ही तप, जप, त्याग, पूजा, दान, संयम आदि करते हैं, यहाँ तक कि साधुवेश भी धारण कर लेते हैं और पुण्य करणी करके देवत्व, राज्यत्व पाता है, परन्तु संसार का अन्त नहीं ला सकते। इसलिये इन व्यक्तियों का यम, नियमादि योग, सच्ची पारमार्थिकता से रहित होने के कारण, अतात्त्विक कहा है। व्यवहार से चाहे उसे योग कहें परन्तु निश्चयनय से तो वह अतात्त्विक है। हालांकि वह भी अध्यात्म-आत्मा में चैतन्यगुण आदि है, इस प्रकार की बातें करता है। वैराग्य की विचारणा होती है। संसार की आधि, व्याधि, उपाधियों से थक जाता है, परन्तु आत्मा का पारमार्थिक स्वरूप न जानने के कारण, अज्ञान, मिथ्यात्व, कषाय और विषयों की लालसा अन्दर से नष्ट नहीं होती। इसलिये उसका अध्यात्मादि योग-अशुद्ध अध्यवसायों वाला होने से उत्तम मोक्ष फल को नहीं देता। परन्तु प्रायः संसार में नये-नये जन्म-मरणरूप अपाय-दुःख को देने वाला ही होता है, क्योंकि मात्र बाह्यवेश से अध्यात्म की सिद्धि नहीं होती, इसलिये इनकी अयोग्यता कही गई है। टीकाकार ने इन की अयोग्यता का बड़े सुन्दर ढंग से वर्णन किया है / उन्होंने लिखा है : "नेपथ्यचेष्टाभाषादिलक्षणं श्रद्धाशून्यवस्तु" अर्थात् जिसके अन्दर श्रद्धा नहीं (ज्ञान नहीं) केवल भौतिकसुखों की लालसा अथवा अपनी मान प्रतिष्ठा के लिये ही जो तप, जप, ध्यान, संयम आदि करता है, वह नाट्यशाला के नट से अधिक नही है / नट भगवान का स्वांग कर सकता है उनके जैसी चेष्टा कर सकता है और भाषा भी वैसी बोल सकता है, लोगों को रिझा भी सकता है, लेकिन भगवान नहीं बन सकता / वैसे ही भोगों का लालची संयम और अध्यात्म का स्वांग रच सकता है, साधु वेशादि मात्र से श्रद्धा पैदा कर सकता है, परन्तु इससे वह अपने लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता / इसलिये ऐसे श्रद्धाविहीन व्यक्तियों का योग अतात्त्विक कहा है, वह उत्तमफल नहीं ला सकता / प्राय: वह जन्ममरण के दुःखरूपी फलों को ही लाता है /
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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