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________________ 209 योगबिंदु और सर्वरूप से पाप से बचना सर्वविरति चारित्र है। सम्यक् दृष्टि श्रावक के 12 व्रतों को ग्रहण करना देशविरति चारित्र है। इसमें पांच महाव्रतों का देश से, अर्थात् अमुक मर्यादा में पालन होता है और दिशा परिमाण, भोगोपभोग परिमाण, अनर्थदण्डत्याग, सामायिक, देशावकाशिक, पौषध और अतिथि संविभाग का समावेश होता है। संपूर्णरूप से पंचमहाव्रतों को ग्रहण करना, रात्रिभोजन का सर्वथा त्याग करना आदि सर्वविरति चारित्र है / जब यह चारित्र जीवन में सध जाता है तब पूर्व में जो योग की प्रक्रिया बताई है उसके अनुसार अध्यात्म, भावना, ध्यान, समता और वृत्तिसंक्षयरूप उसकी प्रवृत्ति होती है // 357|| औचित्याद् वृतयुक्तस्य वचनात् तत्त्वचिन्तनम् / मैत्र्यादिसारमत्यन्तमध्यात्मं तद्विदो विदुः // 358 // अर्थ : औचित्य से व्रत का आचरण करना, जिनवचनानुसार तत्त्वचिन्तन करना, मैत्र्यादिभावना के सार को अच्छी तरह से समझना, अध्यात्मवेत्ता इसको अध्यात्म कहते हैं // 358|| विवेचन : औचित्य-उचित प्रवृत्ति के अनुसार सारासार को जानकर, विवेकपूर्वक श्रावकश्राविका के अणुव्रत और साधु-साध्वी के महाव्रतों को सम्यक् प्रकार से पालना; जीव-अजीव, पापपुण्य आदि तत्त्वों का, जिनेश्वर परमात्मा द्वारा प्रणीत सप्तनय, सप्तभंगी, चार या छ: निक्षेप और दो प्रमाणों से चिन्तन करना, मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ्य भावना के सारतत्त्व को अच्छी तरह से समझकर, मैत्रीभावना से सर्वजीवों का हितचिन्तन करना; प्रमोद भावना से गुणीजनों की प्रगति देखकर उनकी अनुमोदना करना, स्तुति करना; करुणाभावना से दुःखीजीवों को देखकर, उनके दुःखों को दूर करने के लिये सक्रिय कदम उठाना; मध्यस्थभावना से धर्म से हीन अधर्मी, क्रूरों के प्रति भी समभाव रखना, उनके प्रति वैरभाव या वैमनस्य न रखना; इस प्रकार इन भावनाओं के सार का जीवनसात् करने को महापुरुषों ने अध्यात्म योग कहा है // 358 / / तात्पर्य यह है कि विवेकपूर्वक सत्पथ का अनुसरण करना, वीतराग-वचनानुसार संसार में जो जीव, अजीव, पाप, पुण्य तत्त्व हैं उनका चिन्तन करना, मैत्र्यादि को जीवन में स्थान देना अध्यात्मयोग कहा जाता है // 358|| अतः पापक्षयः सत्त्वं, शीलं ज्ञानं च शाश्वतम् / तथानुभवसंसिद्धममृतं ह्यद एव तु // 359 // अर्थ : इस (अध्यात्म) से पाप का क्षय, तेज ओजस् की वृद्धि, चित्त की समाधि, शाश्वत ज्ञान तथा अनुभव सिद्ध अमृत की प्राप्ति होती है // 359 // विवेचन : अध्यात्म योग के अभ्यास से कर्मों की सर्वदुष्ट प्रकृतियों का नाश होता है।
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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