________________ योगबिंदु 207 गुणों के प्रति ही आकर्षण होता है व्यक्ति के प्रति नहीं; पांचवा वह सदा प्रशस्त प्रवृत्ति में ही पुरुषार्थ करता है, अन्य में नहीं और छठा अपनी शक्ति को छिपाये बिना, पूरी शक्ति लगाकर सत्कार्य करने वाला होता है / इस प्रकार देशविरति के ये चिह्न है, ये लक्षण हैं // 353 / / असातोदयशून्योऽन्धः, कान्तारपतितो यथा / गर्तादिपरिहारेण, सम्यक् तत्राभिगच्छति // 354 // तथाऽयं भवकान्तारे, पापादिपरिहारतः / श्रुतचक्षुर्विहीनोऽपि, सत्सातोदयसंयुतः // 355 // अर्थ : अशातावेदनीय कर्म जिसका उदय नहीं हुआ ऐसा अन्ध व्यक्ति भयंकर-गहनवन में पड़ा हुआ भी जैसे गर्तादी-विषममार्ग का त्याग करके, सम्यक् मार्ग की ओर आता है वैसे ही यह (देशविरति चारित्री) संसार अटवी में पापादि प्रवृत्ति का त्याग करके, श्रुतचक्षुहीन होने पर भी सत्-श्रेष्ठ शातावेदनीय कर्मोदय से (योग्यमार्ग-मोक्षानुकूल मार्ग की ओर आता है) // 354-355 // विवेचन : अशातावेदनीयकर्म जिसका उदय नहीं हुआ है अर्थात् निरोगी, शक्तिवान कोई अन्धव्यक्ति दैवयोग से कभी दण्डकारण्य जैसे भयंकर जंगल में आ फँसा हो, तो वह जंगल की विषम उबड़ खाबड़ जमीन, पत्थर के टुकड़े, काटे, कंकर आदि से अपने आप को यतनापूर्वक बचाकर, धीरे-धीरे उपयोग रखकर, धीरज पूर्वक उस विषम मार्ग को पार करके, अपने इष्ट स्थान पर पहुँच जाता है। भयंकर जंगल को भी अपनी हिम्मत से पार कर लेता है। वैसे ही संसाररूपी जंगल में पड़ा हुआ देशविरति भव्यात्मा, शास्त्रज्ञानरूपी चक्षु न होने पर भी अर्थात् शास्त्र का ज्ञान नहीं होने पर भी, पापादिक अर्थात् पाप का कारण और पाप का फल देने वाली अशुभ प्रवृत्तियों का त्याग करके, पापमय कार्यों को छोड़कर, सद्भावरूप-शातावेदनीय से युक्त होकर, भव अटवी को पार करता है / अर्थात् अन्धव्यक्ति जैसे अशातावेदनीय के उदय से शून्य, निरोगी और शक्तिवान होने के कारण विषममार्ग को यतना पूर्वक पार करके, इष्ट स्थान पर पहुंचता है, वैसे चारित्री भी पापमय प्रवृत्तियों से बचता है। शातावेदनीयरूप शुभ संकल्पों से भावों की वृद्धि करता हुआ विषम संसार को पार करके, इष्ट स्थान स्वर्ग या मोक्ष को प्राप्त करता है। श्रुतचक्षुविहीन उसे इसलिये कहा है कि इस अवस्था में उसे शास्त्र का बोध नहीं होता / यहाँ मार्गानुसारी की प्रवृत्ति बताई है कि वह सत्पथ का ही अनुसरण करता है / पापप्रवृत्ति नहीं करता / इसीका नाम मार्गानुसारित्व है // 354-355 // अनीदृशस्य तु पुनश्चारित्रं शब्दमात्रकम् / ईदृशस्यापि वैकल्यं, विचित्रत्वेन कर्मणाम् // 356 //