SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 255
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ योगबिंदु 203 और पाचक निमित्त कारण है। दोनों के सहयोग से मूंग पकते हैं, लेकिन कोडकु मूंग (ऐसा मूंग जो पके ही नहीं सके) पकाने में अग्नि और पाचक निमित्त नहीं भी बनते / अनेकान्तिकभाव का तात्पर्य है कि नियत सम्बंध नहीं, कभी-कभी निमित्त कारण साध्य को सिद्ध करता है; कभी नहीं भी सिद्ध करता / गुरु का उपदेश भव्यजीवों की गुणवृद्धि में निमित्त कारण है। परन्तु कभी-कभी उपदेश के बिना भी पूर्वजन्म के सत्संस्कारों से, सहजभाव से ही सदनुष्ठान में प्रवृत्ति होती है / प्रायः भव्यात्माओं को गुरु का उपदेश सदनुष्ठान प्रवृत्ति में पुष्टावलंबनरूप होता है, परन्तु कभी-कभी बहुत भवाभिनन्दी 'सुभूम चक्रवर्ती जैसों के प्रति उपदेश सफल नहीं भी होता / जो स्वयंबुद्ध और प्रत्येक बुद्ध महात्मा हैं उनको उपदेश की आवश्यकता नहीं होती और यद्यपि बहुल संसारी भवाभिनन्दी जीवों के लिये उपदेश कोड़कु मूंग और उसरभूमि की भाँति साध्य को सिद्ध करने में असफल होता है, परन्तु इससे उपदेश की व्यर्थता सिद्ध नहीं होती। उपदेश की तो आवश्यकता अनिवार्य है // 346 // प्रक्रान्ताद् यदनुष्ठानादौचित्येनोत्तरं भवेत् / तदाश्रित्योपदेशोऽपि, ज्ञेयो विद्यादिगोचरः // 347 // अर्थ : स्वतः आरब्ध अनुष्ठान से उत्तर भव में जो उचितता का लाभ होता है, तदाश्रित विधि निषेधात्मक उपदेश भी सफल समझना चाहिये // 347|| विवेचन : स्वयं आरम्भ किये हुये अनुष्ठान जैसे कि शास्त्र श्रवण की प्रबल इच्छा, शास्त्रों के सम्यक् बोध से चैत्यवन्दन अर्थात् वीतराग परमात्मा की पूजा, भक्ति, स्तुति, संगीत, नृत्य, वाद्य के साथ करते-करते; गुरुभक्ति, गुरुसेवा, वन्दना, स्तवना आदि अनुष्ठानों को यथाशक्ति, उचित प्रकार से, द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अनुकूलतानुसार करते हुए; उनके दृढ़ संस्कारों से उत्तरकाल में अर्थात् भावी जन्म में भी जीवात्माएं बिना उपदेश के अपने स्वत:भाव से अनुष्ठानों की श्रेष्ठ-श्रेष्ठतर प्रवृत्ति करता है, तो क्या ऐसे स्वयं प्रेरित अनुष्टाताओं के लिये उपदेश निरर्थक है ? तो कहते है नहीं, जरा भी व्यर्थ नहीं क्योंकि उपदेश तो सदनुष्ठान की पुष्टि करता है / जैसे विद्याशिक्षक गुरु का उपदेश, करने योग्य को करने के लिये, और त्याग करने योग्य को छोड़ने के लिये, विधि-निषेधक होता है। वैसे ही यहा सफल समझना चाहिये। कहा भी है : उवदेशो वि हु सफलो, गुणठाणारंभगाण जीवाण / परिवडमाणाणतहा, पायं बहु तढ़ियाणं वि // उपदेशपद-४९९ महापुरुषों का सदुपदेश भव्यात्माओं को उत्तरोत्तर गुणस्थानक की श्रेणी का आरम्भ कावाता है और उत्तम प्रकार के फल को देने वाला होता है और अन्य दूसरे गुणश्रेणी से गिरे हुओं को भी उपकारक होता है, चारित्र से भ्रष्टात्माओं को भी चारित्र में स्थिर करता है / इसलिये आरम्भ करने योग्य अनुष्ठानों का उपदेश जीवों को जब भी दिया जाय वह योग्य और सफल ही है क्योंकि उससे उनकी पुष्टि होती है // 347||
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy