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________________ 202 योगबिंदु होने के लिये भी उसे किसी अन्य गुरु या किसी के उपदेश की आवश्यकता नहीं होती / शुद्ध हृदय अन्तः करण से ही उसे ऐसी स्फुरणाएं उत्पन्न होती है और ग्रंथीभेद होने पर जो परमपुरुषार्थ प्रकट होता है, उसकी प्रेरणा से ही वह स्वयं ही उन सत् प्रवृत्तियों में प्रवृत्त होता है। सार यह है कि ग्रंथीभेद होने पर आत्मा स्वयंप्रेरित उचित प्रवृत्ति करता है उसमें किसी के उपदेश या प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती है // 344 // अतस्तु भावो भावस्य, तत्त्वतः संप्रवर्तकः / शिराकूपे पय इव, पयोवृद्धेर्नियोगतः // 345 // अर्थ : इस प्रकार वस्तुतः भाव, भावान्तर को पैदा करता है (प्रेरित करता है) जैसे शिराकूप का जल निश्चित ही जलवृद्धि करता है // 345 // विवेचन : जैसे कआँ खोदने पर भूमि के अन्तस्तल से प्रकट होने वाली छोटी-छोटी जल की नीकों, झरणों से जल आता है, और कुएँ में जल वृद्धि का हेतु बनता है, उसी प्रकार ग्रंथीभेद होने पर जो भवनिर्वेदरूप भाववैराग्य प्रकट होता है, वह दूसरे शुभभावों को प्रकट करने में निमित्त बनता है / अर्थात् ग्रंथीभेद से जो भवनिर्वेद प्रकट होता है वह जीवात्मा को उचित प्रवृत्ति में ही जोड़ता है, और उचित प्रवृत्तित्वभाव मोक्ष में दृढ़ विश्वास, परमप्रीति को उत्पन्न करता है, और वह प्रीति वह सम्यक्दर्शन को उत्पन्न करती है / सम्यक्दर्शन अन्य सैकड़ों अन्य शुभभावों को उत्पन्न करता है इस प्रकार वस्तुतः कुएँ के अन्दर रहे हुये झरणों से कुएँ की जलवृद्धि की भांति, एक भाव दूसरे भावों को और दूसरा अन्य सैकड़ों भावों को उत्पन्न करता है / तात्पर्य यह है कि ग्रंथीभेद के पश्चात् पूर्वभाव उत्तरभाव का कारण बनता है और उत्तरोत्तर भावों की शुद्धि और वृद्धि होने से आत्मा प्रगति पथ पर आरुढ़ होती है // 345 // प्रश्न है - अगर उपदेश बिना ही उचित प्रवृत्ति होती हो तो उपदेश व्यर्थ हुआ तो कहते हैं : निमित्तमुपदेशस्तु, पवनादिसमो मतः / अनैकान्तिकभावेन, सतामत्रैव वस्तुनि // 346 // अर्थ : सज्जनों के मतानुसार उपदेश तो पवनादि के समान निमित्तमात्र है (क्योंकि) यहाँ वस्तु के सम्बंध में अर्थात् मुक्ति के सम्बंध में उपदेश का (निमित्त का) अनेकान्तिक भाव याने नियत सम्बंध नहीं है, अर्थात् कभी निमित्त बन भी सकता है कभी निमित्त नहीं भी बनता // 346 / / विवेचन : उपदेश तो निमित्त कारण है जैसे कूपजल के लिये खनन और पवन निमित्त कारण है / भूमि खोदने से और पवन के सहयोग से भूमि के अन्दर से जल बाहर आता है, परन्तु कभी-कभी भूमि रसवती नहीं होती तो पानी नहीं भी आता / इसी प्रकार मूंग पकाने के लिये अग्नि
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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