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________________ योगबिंदु 195 उस काष्ट से प्रतिमा निर्मित हो सकती है, ऐसी उसमें योग्यता है, परन्तु शिल्पी के पुरुषार्थ की उसमें अपेक्षा रहती है। उसके पुरुषार्थ के बिना, योग्यता होने पर भी प्रतिमा तैयार नहीं हो सकती। इसी प्रकार कर्म में विचित्र फल-नाना प्रकार के सुख-दुखादि फल देने की योग्यता है, परन्तु पुरुषार्थ विशेष के बिना फल प्रकट नहीं हो सकता / इसलिये कर्म बाध्य है - अन्यक्त है और पुरुषार्थ बाधक है - फल लाने में समर्थ है। इसी प्रकार जब काष्ट से प्रतिमा निर्मित हुई तब प्रतिमा काष्ट योग्यता की बाधक और योग्यता बाध्य हुई / इसीलिये कर्म जो विचित्रफल पैदा करने की योग्यता वाला है उसे प्रतिमा योग्यता जैसा कहा है। जब पुरुषार्थ के सहयोग से काष्ट से प्रतिमारूप परिणाम प्रकट होता है, तब कर्म का बाध होकर, पुरुषार्थ बाधक बनता है। इस प्रकार कर्म और पुरुषार्थ का बाध्य-बाधकभाव युक्ति पूर्वक घटित होता है / कर्म को पुरुषार्थ की सहायता जरूरी है और पुरुषार्थ को कर्म का बल जरूरी है। इस प्रकार दोनों एक दूसरे के पूरक बनकर, फलविशेष को पैदा करते हैं, अकेला कोई भी कुछ नहीं कर सकता / अतः दोनों का अपना-अपना नियत स्वभावयोग्यता मानना जरूरी है // 331 / / नियमात् प्रतिमा नात्र, न चातोऽयोग्यतैव हि / तल्लक्षणनियोगेन, प्रतिमेवास्य बाधकः // 332 // अर्थ : अवश्य काष्ठ में प्रतिमा नहीं क्योंकि उसमें अयोग्यता है, ऐसा भी नहीं (कह सकते) उसके लक्षण-नियोग से प्रतिमा ही उसकी बाधक है // 332 / / विवेचन : निसन्देह, काष्ठ में प्रतिमा भले स्पष्ट रूप से दिखाई न दे, परन्तु उसमें प्रतिमा बनने की योग्यता का हम निषेध नहीं कर सकते, क्योंकि योग्यता उसमे विद्यमान है / प्रतिमा न बनने में जो बाधक है, वह शिल्पी के पुरुषार्थ का अभाव है। इसीलिये यह योग्यता रूपी क्रिया पुरुषार्थ के अभाव से बाध्यभाव में रही हुई है, और प्रतिमा इस (योग्यता) की बाधक है / इसी प्रकार आत्मा में कर्मरूप पुद्गल बाध्यभाव से रहे हुये है और पुरुषार्थ बाधक भाव से विद्यमान है। लेकिन जब तक आत्मा आत्मस्वरूप प्रकट करने वाला बलवान पुरुषार्थ प्रकट न करे, तब तक कर्म बाधक बनकर, आत्मस्वरूप को ढंकते हैं; आत्मस्वरूप को विकृत बनाते हैं; विपरीत परिणाम लाते हैं; परन्तु जब आत्मा जाग्रत होकर, कर्मदल को नष्ट करने का दृढ़निश्चयात्मक उत्कृष्ट पुरुषार्थ करता है तब बाधक बना हुआ वह कर्मदल बाध्य बन जाता है। इस प्रकार पुरुषार्थ कर्मरूप बाध्य का बाधक अर्थात् नाश करने वाला होता है // 332 / / दार्वादेः प्रतिमाक्षेपे, तद्भावः सर्वतो ध्रुवः / योग्यस्यायोग्यता चेति, न चैषा लोकसिद्धितः // 333 //
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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