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________________ 144 योगबिंदु अपेक्षते ध्रुवं ह्येनं, सद्योगारम्भकस्तु यः / नान्यः प्रवर्तमानोऽपि, तत्र दैवनियोगतः // 238 // अर्थ : जो सद्योगारम्भक (सानुबंध-अनुष्ठाता) है, वह निश्चित ही आत्मादि प्रत्यय की अपेक्षा रखता है परन्तु अन्य (जीव) दैव की प्रबलता-कर्म की बहुलता के कारण योग में प्रवृत्ति करने पर भी (आत्मादि की प्रतीति बिना) सद्योग का आरम्भ नहीं कर सकता // 238 / / विवेचन : जिस योगी को सत्ययोग का आरम्भ करना है; निश्चय ही वह सर्वप्रथम आत्मादि स्वरूप को जानने के लिये सद्गुरु से अनुभवज्ञान लेगा; आत्मादि का स्वरूप गुरु से अच्छी तरह से समझकर, उस पर संपूर्ण श्रद्धा रखेगा और आत्म श्रद्धा से फिर वह योग की प्रवृत्ति करता है ऋ सत्ययोग की प्राप्ति के लिये आत्मादि पर संपूर्ण श्रद्धा-प्रतीति अत्यन्त जरूरी हैं / सत्ययोगारम्भक सतत् आत्मादि प्रत्यय की अपेक्षा रखते हैं / तभी वे अपने साध्य मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं / परन्तु अन्य जो विषयशुद्ध अनुष्ठान और स्वरूप शुद्ध अनुष्ठान करने वाले प्रथम और द्वितीय प्रकार के अनुष्ठाता है, उनमें कर्मों की प्रबलता होती है। अति चिकना कर्म संग्रह इतना होता है कि देखादेखी यम नियम आदि योगमार्ग में प्रवृत्ति करने पर भी आत्मादि की प्रतीति न होने के कारण वे सत्य योग का आरम्भ कभी नहीं कर सकते / सद्योगारम्भक व्यक्ति में आत्मा, गुरु, लिंग आदि पर संपूर्ण प्रतीति-विश्वास होता है, जो मोक्ष का कारण बनता है। इससे अन्य को योग क्रिया तो होती ही है परन्तु वह आत्मा, गुरु और लिंग प्रत्यय से विकल होने से अज्ञान, मिथ्यात्व, कषाय और अशुभयोग के बल से पराधीन बना हुआ सत्य योग का आरम्भ नहीं कर सकता // 238 // आगमात् सर्व एवायं, व्यवहारः स्थितो यतः / तत्रापि हाठिको यस्तु, हन्ताऽज्ञानां स शेखरः // 239 // अर्थ : यह सब (योगमार्गोपयोगी) व्यवहार (हेयोपादेयरूप) आगम में प्रसिद्ध है; (उस व्यवहार के छोड़कर) मोक्ष के लिये प्रवृत्ति में भी जो हठ करने वाला है वह मूों का सरदार हैं // 239 // विवेचन : यह सब योगमार्ग के उपयोगी हेय-उपादेय रूप व्यवहार आगमों में प्रसिद्ध है। हमने हमारे घर की कोई बात नहीं कही / वीतराग परमात्मा द्वारा प्ररूपित वाणी को ही यहाँ बताया गया है। ऐसे सर्वज्ञ आप्त महापुरुषों के वचनों पर विश्वास या श्रद्धा न रखकर, जो केवल अपनी कल्पना से स्वच्छन्द प्रवृत्ति करता है, वह मुर्खशिरोमणि है / क्योंकि योग का फल इन्द्रियगोचर नहीं परन्तु अगोचर है। ऐसे अगोचर विषय में सर्वज्ञ आप्तपुरुषों के वचनों में श्रद्धा रखना नितान्त आवश्यक है / वह श्रद्धा वीतराग प्रणीत आगमों का गुरुगमपूर्वक अभ्यास करने से पैदा होती है। इसलिये सद्योग की प्राप्ति के लिये आज्ञा उल्लंघन करने वाले को हठवादी और मूर्खशिरोमणि कहा है // 239 //
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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