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________________ 142 योगबिंदु विवेचन : जो सिद्धि अन्य विशेषगुणरूप सिद्धियों का अंग-निमित्त अथवा उपादान कारण बने जैसे यथाप्रवृत्ति-करण अपूर्वकरण के लिये; अपूर्वकरण ग्रंथीभेद के लिये; ग्रंथीभेद अन्तःकरण की शुद्धि के लिये; अन्तःकरण की शुद्धि सम्यक्त्व के लिये; सम्यक्त्व देशचारित्र और सर्वविरति चारित्र के लिये, चारित्र सर्वसंवर के लिये; सर्वसंवर निर्जरा के लिये; निर्जरा शुक्लध्यान के लिये; शुक्लध्यान घातीकर्मनाश के लिये; घातीकर्मों का नाश केवलज्ञान और केवलदर्शन के लिये; केवलज्ञान और केवलदर्शन सर्वकर्म निर्जरा के लिये और सर्वकर्मनिर्जरा मोक्ष के लिये होती है / इस प्रकार जो पूर्वसिद्धि उत्तरोत्तर अन्य उत्तमसिद्धियों की परम्परा का संयोग सम्बंध करवाती है, निःसन्देह वही अत्यन्त शुद्धतावाली एकान्तिक सिद्धि है। उसमें पतन का सम्भव नहीं, परम्परा से भी पतन करवाने में वह समर्थ नहीं है, सदैव हितकारी है। आत्मा, गुरु और लिंगादि तीनों प्रत्ययज्ञान से यह सिद्धि युक्त है // 235 // न ह्युपायान्तरोपेयमुपायान्तरतोऽपि हि / हाठिकानामपि यतस्तत्प्रत्ययपरो भवेत् // 236 // अर्थ : उपायान्तर साध्य वस्तु, उपायान्तर से हठ करने पर भी सिद्ध नहीं होती इसलिये आत्मादि के प्रत्यय परायण होने की जरूरत है // 236 / / विवेचन : जिस उपाय से जिस वस्तु की प्राप्ति होती हो, उसे छोड़कर अन्य चाहे कितने ही उपाय हठपूर्वक किये जायें फिर भी कार्य की सिद्धि नहीं होती / जैसे मृत्पिण्ड से घट का निर्माण होता है लेकिन मिट्टी को छोड़कर, कोई कुम्भार सूत्र से घड़ा बनाने के लिये हजारों उपाय हठ पूर्वक करे, तो क्या वह घट निर्माण में कभी सफल हो सकता है ? इसी प्रकार आत्मा, गुरु और धर्म स्वरूप के चिह्नों का यथास्वरूप ज्ञान और श्रद्धारूपी प्रत्यय, जो मोक्ष का उपादान कारण है, उसको छोड़कर, यम, नियम, तप, जप, आतापना, प्राणायाम आदि धर्मक्रिया अत्यन्त हठपूर्वक की जाएँ फिर भी साध्य (मोक्ष) सिद्ध नहीं हो सकता, परमानन्द की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। इसलिये मनुष्य को आत्मादि प्रत्यय परायण होना चाहिये / आत्मा, गुरु और धर्म (चारित्र) के चिह्नों की यथास्वरूप श्रद्धा और ज्ञानपूर्वक प्रत्यय अर्थात् उनके प्रति-विवेक पूर्वक विश्वास परायण होकर, जो योगी मोक्ष प्राप्ति के लिये अप्रमादपूर्वक प्रवृत्ति करता है अथवा अभिलाषा करता है; वह अवश्य मोक्षरूप साध्य को प्राप्त करता है (अतः मनुष्य को आत्मादि प्रत्यय परायण होना चाहिये) / जो वस्तु बनानी हो, उस के अनुरूप साधन की जरुरत रहती है यथा घर निर्माण में मिट्टी और वस्त्र बनाने के लिये सूत्र की जरुरत होती है। उसी प्रकार मोक्षरूपी साध्य की सिद्धि के लिये आत्मश्रद्धा, सत्गुरु श्रद्धा और चारित्र प्रत्यय जरुरी है। जो आत्मा, गुरु और लिंग के विश्वास-श्रद्धा से विकल है; मुख्य साधनों को छोड़कर, हजारों अन्य अनुष्ठानरूपी उपाय करने पर भी वे अपने साध्य अर्थात्
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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