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________________ 108 योगबिंदु जब कर्ममल अल्प रह जाता है और भावों में निर्मलता आ जाती है, तब कदाग्रह छूट जाता है। मनुष्य चाहे कितना ही महान् क्यों न बन जाय परन्तु कदाग्रह की वृत्ति उसे पथभ्रष्ट कर देती है। उसका सत्य भान भूला देती है। कदाग्रह बड़ी खराब वस्तु हैं / ग्रंथकार कहना चाहते हैं कि जिन व्यक्तियों की कदाग्रहवृत्ति छूट जाती है वे व्यक्ति जो भी देवपूजा, गुरुभक्ति, दान, पुण्य, तप, जप, व्रत पच्चखाण आदि पूर्वसेवा रूप जो भी धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, वे निश्चित ही उनके शुभ के लिये होते हैं / निःसन्देह कल्याणकारी होते हैं। क्योंकि उनमे मिथ्यात्व, अज्ञान, प्रमाद, कषायों की क्षीणता अति कमजोर है / जब ज्ञानदशा जागृत होती है तब व्यक्ति सत्योन्मुख होता है // 171 / / नात एवाणवस्तस्य प्राग्वत् सङ्क्लेशतवः / तथाऽन्तस्तत्त्वसंशुद्धेरुदग्रशुभभावतः // 172 // अर्थ : आग्रह निवृत्त होने पर अति उत्तम शुभ भावों द्वारा अन्तःकरण की शुद्धि होने से चरमावर्ती जीव के कर्म-अणु पूर्वावर्त की भांति क्लेशकारक नहीं होते // 172 / / विवेचन : चरमावर्त में आने पर जीव का मिथ्याभिनिवेश-अतत्त्व में तत्त्व बुद्धिरूप कदाग्रह छूट जाता है / आग्रहनिवृत्त होने पर भावों में निर्मलता आती है और अन्तःकरण उत्तरोत्तर शुद्ध होता जाता है / इसलिये पूर्वावों में जो कर्मदल अत्यन्त गाढ़ होने से जीव को दुःखी करते थे; वे अब चरमावर्त में कमजोर पड़ जाते हैं; उनका बल क्षीण हो जाता है; आत्मशक्ति अधिक बलवान हो जाती है इसलिये चरमावर्ती जीव के कर्मदल पूर्व की भाँति क्लेशकारक नहीं होते, क्योंकि दुनियाँ का नियम है बलवान कमजोर को दबाता है। पहले आत्मशक्ति कमजोर थी इसलिये जीव पर कर्मों का आधिपत्य था। चरमावर्त में आत्मा बलवान होती है इसलिये वह कर्मों पर अपना आधिपत्य जमा लेती हैं // 172 / / सत्साधकस्य चरमा समयाऽपि विभीषिका / न खेदाय यथाऽत्यन्तं तद्वदेतद् विभाव्यताम् // 173 // अर्थ : जैसे सत्साधक को चरम समय की विभीषिका अत्यन्त खेद उत्पन्न नहीं करती वैसा ही चरमावर्तों के बारे में विचारे करें // 173|| विवेचन : जब कोई साधक किसी मंत्र या विद्या की साधना में प्रवृत्त होता है, तो उसके साधना-काल के दरम्यान तथा उसकी सफलता की अन्तिम घड़ी-पर्यन्त उसे भूत, वेतालादि की तरफ से अनेक विभीषिका-भय-उपद्रव, उपसर्ग खड़े हो जाते हैं, भयंकर दृश्य सामने आते हैं, लेकिन जो सच्चा साधक हैं; वह कभी भी इससे खिन्न नहीं होता / उस पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। उसका मन इससे विचलित या क्षुभित नहीं होता / इसी प्रकार चरमपुद्गल परावर्त में
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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