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________________ योगबिंदु वचन और काया की सर्वप्रवृत्ति, उन गुणों के विनाश के लिये नहीं होती अर्थात् वे लोग जिस प्रवृत्ति से आत्मा के ज्ञान, दर्शन और चारित्र रूप गुणों का विनाश होता हो ऐसी प्रवृत्ति से हमेशा दूर रहते हैं, बचकर रहते हैं और सत्प्रवृत्ति से आत्मगुणों को प्रकट करने में सतत् उद्यमशील रहते हैं // 141 // स्वाराधनाद् यथैतस्य फलमुक्तमनुत्तरम् / मलनातस्त्वनर्थोऽपि महानेव तथैव हि // 142 // __ अर्थ : जैसे इनकी (आत्मगुणों की) सम्यक् आराधना से सर्वोत्कृष्ट फल (मोक्ष) कहा है; उसी प्रकार उनके (सम्यक् ज्ञानादि आत्मगुणों के) विनाश से अनर्थ भी महान् होता है // 142 // विवेचन : मोक्ष को सर्वोत्तम फल कहा है क्योंकि संसार में सभी पौगलिक सुख क्षणिक है, परन्तु मोक्ष का जो सुख है वह शाश्वत-नित्य रहने वाला है। सम्यक् दर्शन, ज्ञान और चारित्रादि आत्मा के गुणों की सम्यक् आराधना से जब पूर्ण विकास हो जाता है अर्थात् सर्वमल नष्ट हो जाता है और सर्वशुद्धावस्था प्राप्त होती है तब मनुष्य सर्वोत्तम फल मोक्ष को प्राप्त करता है। उसी प्रकार उन गुणों के विनाश से अनर्थ भी बहुत होता है, क्योंकि कमल के कारण ही तो मनुष्य दुःखदायी अनेक नरकादि पामर योनियों तथा गतियों में भटकता है और महान दुःख रूप अनर्थ को पाता है // 142 // उत्तुङ्गारोहणाद् पातो विषान्नात् तृप्तिरेव च / अनर्थाय यथाऽत्यन्तं मलनाऽपि तथेक्ष्यताम् // 143 // अर्थ : अति ऊँचे पर्वत शिखर से गिरना और विषमिश्रित अन्न से तृप्त होना, जिस प्रकार अत्यन्त अनर्थ के लिये होता है; मल के लिये भी वैसा ही समझें // 143|| विवेचन : अति ऊँचे पर्वत शिखर से गिरना और विषमिश्रित भोजन करना जैसे उसके जीवन विनाश (पीडायुक्त कुमरण) का कारण होता है / उसी प्रकार जीवहिंसा, असत्य, चोरी, व्यभिचार परिग्रह, अभक्ष्य-भक्षण, रात्रिभोजन, असत्य बोलना, भावना पापोपदेश (कुगुरु, कुधर्म, कुदेव की आराधना), मिथ्यात्व, कषाय, अशुभयोग आदि एवं जीव हिंसारूप कर्ममल भी अनर्थकारी है / मल-कर्ममल तो ऐसा अनर्थ करने वाला है कि मनुष्य के असंख्यात् भवों को बिगाड़ देता है, क्योंकि अनादि काल से उसका ऐसा स्वभाव चला आता है / जैन सिद्धान्तानुसार उपरोक्त मृत्यु को बालमरण कहते हैं / बालमरण से मनुष्य का संसार बढ़ता है इहलोक-परलोक दोनों बिगड़ते हैं। क्योंकि उसके मूल में अज्ञानता है, ऐसा माना गया है। इसलिये इसकी मल के तौर पर उपमा उपयुक्त ही दी हैं // 143||
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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