________________ योगबिंदु धारण करने वाले; (उन व्रतों के सूचक) मुनि के जो लिंग-रजोहरण, मुहपत्ति, डंडा आदि साधुवेश को धारण करने वाले, साधु सन्त विशेष सुपात्र हैं, क्योंकि वे मुनि आहार के लिये स्वयं रसोई बनाते नहीं हैं और न ही बनवाते हैं / परन्तु अन्य गृहस्थों के घरों में उनके अपने कुटुम्ब के लिये जो रसोई बनी हो, उसमें से ही मधुकरी अथवा गोचरीवृत्ति के अनुसार घर-घर घूमकर, अल्प-अल्प ग्रहण करके वे अपनी आत्मा को संयम में संतुष्ट रखते हैं / दशवैकालिक अध्ययन में इस प्रकार कहा भी हैं: महुकारसमा बुद्धा, जे भवंति अणिस्सिया / नाना पिंडरया दंता, तेण वुच्चंति साहुणो // त्तिबेमि // दशवैकालिक 1/5 सदा अपने आगम शास्त्रों के अनुसार संयम जीवन व्यतीत करते हैं / वीतराग देव की आज्ञा का उल्लंघन न हो जाय इस प्रकार की सतत् जागृति रखकर वैसा आचरण-व्यवहार रखने वाले हैं। इसलिये ऐसे आत्मलक्षी, संयमी साधु सन्तों के प्रति हमेशा भक्तिभाव रखकर, पूज्यभाव से विधिपूर्वक दान देना चाहिये, क्योंकि वह योगमार्ग को पाने का महान उपाय है। इस श्लोक में ग्रंथकार ने अपनी इच्छानुसार फकीरी ग्रहण करने वाले आत्मसाधकों को लिया है। ऐसे लोग हमेशा आदरणीय, वन्दनीय होते हैं // 122 // दीनान्धकृपणा ये तु, व्याधिग्रस्ता विशेषतः / निःस्वाः क्रियान्तराशक्त्या, एतद्वर्गो हि मीलकः // 123 // अर्थ : दीन, अन्ध, कृपण, व्याधिग्रस्त, निर्धन, क्रियान्तराशक्त-अन्य कार्य करने में असमर्थ, ये सब (वर्ग) दान से विशेष पोषण करने योग्य हैं // 123 / / विवेचन : इस श्लोक में अनुकम्पनीय वर्ग बताया है कि दीन-दयनीय स्थिति वाले, अन्धेजो आंखों से देखने में असमर्थ हों और जो पुरुषार्थ करने में कृपण हैं वे, तथा रोगग्रस्त-रक्तपित्त से हाथ और पैरों से पांगले(अपंग) हो तथा क्षय, भगन्दर, जलंदर तथा अनेक भयंकर रोगों से पीड़ितदुःखी हो; जिनकी धन-सम्पत्ति नष्ट हो गई हो और व्यापार करने में असमर्थ हो गये हों; अन्य आजीविका कमाने में जो असमर्थ हो; वे सभी प्राणी दयनीय हैं / अनुकम्पा करने योग्य है इसलिये ऐसे लोगों पर विशेष दया लाकर, उनकी मदद करनी चाहिये / उनका भरण-पोषण करना चाहिये। इस श्लोक में ग्रंथकार ने उस वर्ग को लिया है जो लाचारी, दुर्भाग्य और शारीरिक, मानसिक, भौतिक कारणों से दयनीय हैं - अनुकम्पनीय हैं / अतः ऐसे वर्ग को भी योग प्राप्ति की इच्छा वाला व्यक्ति आदर से, दयापूर्ण हृदय से, अपने धन का उत्सर्ग करे, दान दें / करुणा को धर्म का मुख्य अंग कहा गया है और करुणापारायण हृदय दूसरे के दुःखों को देख नहीं सकता / उनका नवनीत जैसा कोमल हृदय पिघल-पसीज जाता है और दुःखियों के दुःख को दूर करके, उसे परम शांति का, समाधि का अनुभव होता हैं // 123 / /