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________________ योगबिंदु भेदज्ञान-विवेकज्ञान है उससे वंचित ही रह जाता है। परन्तु जो सब को देखता है, सुनता है, मानता है, अनुभव करता है, उसका हृदय खुला होता हैं और उसकी विवेकबुद्धि विकसित होती है और वह यथार्थ तत्त्व-सत्यतत्त्व को पा लेता है। और इस प्रकार धीरे-धीरे जितेन्द्रिय होकर सभी राग, द्वेष, क्रोधादि दोषों को जीतकर नरक, तिर्यञ्चगति रूप दुःखों से भरे हुये संसार समुद्र से पार हो, तर जाता है / उत्तम गति को पा लेता है / तात्पर्य है कि जिसकी बुद्धि एकदेव में अटक जाती है; उसका ज्ञान कूपमण्डूक जैसा होता है। ऐसा व्यक्ति सत्य-असत्य का विवेक खो बैठता है। इसलिये ग्रंथकार ने सर्वदेवों को मान्य रखा है ताकि मनुष्य सत्य-असत्य की विवेक बुद्धि को जन्म दे सके // 118 // चारिसंजीवनीचारन्याय एष सतां मतः / नान्यथाऽत्रेष्टसिद्धिः स्याद् विशेषेणादिकर्मणाम् // 119 // अर्थ : चारिसञ्जीवनी (औषधि विशेष) का 'चरणे भक्षेण न्याय' सज्जनों-संतो को इष्टमान्य है / अन्यथा यहां इष्ट सिद्धि ही न हो / विशेषरूप से यह आदिकर्म-प्राथमिक भूमिका में है // 119 // विवेचन : चारिसञ्जीवनी न्याय में उस महिला की कहानी विहित है जिसने अपने पति को वश में करने के लिये किसी फकीर द्वारा बताई गई औषधि खिलाई और वह बैल बन गया। फिर तो उसके पश्चाताप का पार नहीं रहता / लेने गई पूत और खो दिया पति, जैसी बात बन जाती है। प्रतिदिन की भाँति वह एक दिन अपने पतिबैल को वटवृक्ष के नीचे घास चराने के लिये बहुत ही दुःखी होकर खड़ी है / आकाश में विद्याधर का एक जोड़ा उस रास्ते से निकलता है। उस स्त्री को दुःखी देखकर, विद्याधरी एक अपने पति विद्याधर से उसका कारण पूछती है। विद्याधर अपनी पत्नी को कहता है कि यह बैल नहीं है। इसकी पत्नी ने अपनी मूर्खता से जड़ी बूटी खिलाकर इसे बैल बनाया है। करुणासभर विद्याधरी ने अपने पति विद्याधर से उसके दुःखनाश का उपाय पूछा / तब विद्याधर ने कहा कि इस वटवृक्ष के नीचे तने के मूल में चारु या चारि संजीवनी नामक औषधि उगी हुई है / उस औषधि का वह बैल भक्षण करे तो बैल से परिवर्तित होकर पुनः अपने पुरुष स्वरूप में आ सकता है। उस महिला ने विधाधरों की यह बात सुनी और चारु सञ्जीवनी औषधि को खोजने लगी। परन्तु उसके आकार, रंग और स्वाद आदि से अनजान होने से वह वटवृक्ष के नीचे की समस्त वनस्पति, घास आदि पतिबैल को खिलाने लगी। उसमें चारु सञ्जीवनी औषधि भी साथ ही आ गई और खाई गई उस औषधि से बैल पुनः अपने असली पुरुष स्वरूप में आ गया / वे स्त्री और पुरुष दोनों, आनन्द मनाते अपने घर गये / यहाँ सञ्जीवनी का सम्यक् ज्ञान-पहचान न होने से वह महिला बिना भेदभाव के, सभी प्रकार
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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