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________________ 77 योगबिंदु होकर पवित्र स्थानों में ही उनका नाम स्मरण करना चाहिये / उनका अपवाद, अवर्णवाद, निन्दा आदि न कभी स्वयं करना और न किसी से सुननी चाहिये // 112 // साराणां च यथाशक्ति, वस्त्रादीनां निवेदनम् / परलोकक्रियाणां च, कारणं तेन सर्वदा // 113 // अर्थ : अपनी शक्ति के अनुसार उत्तम वस्त्रादि समर्पण करना तथा सदैव उनकी परलोक साधना में कारणभूत बनना-सहायभूत बनना चाहिये // 113|| विवेचन : उत्तम क्रियानीष्ठ पूज्य गुरुवरों तथा माता-पिता आदि की शक्ति अनुसार भक्ति करने का निश्चय करके उन पूज्य गुरुओं को उत्तम प्रकार के शुद्ध, उपयोग में आ सके ऐसे उपयोगी, योग्य मूल्य वाले वस्त्र, पात्र तथा पथ्यभोजन आदि समर्पण करना; श्रद्धा भक्तिपूर्वक निमन्त्रण देना; माता-पिता, कलाचार्य आदि को भूषण और धन आदि जो उनको योग्य हो, उनको आदर पूर्वक देना चाहिये। तात्पर्य यह है कि वे उत्तमगुरु अपनी साधना में स्थिर होकर उत्तरोत्तर विकास कर सके; इस प्रकार की प्रत्येक अनुकूलता यथाशक्ति प्रदान करना और उनकी अनुकूलताओं का ध्यान रखना; परलोक के लिये भी यथाशक्ति उनके पुण्यार्थ देवगुरु पूजा, सेवा, भक्ति करना, करवाना; अनाथ दीन दुःखियों को दान देना और उनसे दिलवाना; तीर्थक्षेत्र-शत्रुजय, गिरनार आदि तीर्थभूमियों पर उनके स्मरणार्थ अथवा उनकी याद में, उनके नाम से, देवमन्दिर, धर्मशाला, उपाश्रय आदि धर्मस्थान बनवाना / इस प्रकार उनकी परलोक साधना में भी हमेशा अनुकूल सहायता करनी चाहिये, निमित्त बनना चाहिये // 113 // त्यागश्च तदनिष्टानां, तदिष्टेषु प्रवर्तनम् / औचित्येन त्विदं ज्ञेयं, प्राहुर्धर्माद्यपीडया // 114 // अर्थ : उनको (गुरुजनों को) जो इष्ट न हो; उसका त्याग करना; और जो उनको इष्ट हो उसमें प्रवृत्ति करना धर्मादि को किसी प्रकार का नुकसान न हो, ऐसी यथोचित प्रवृत्ति को पूजन कहते हैं // 114 / / जो व्यवहार माता-पिता आदि गुरुजनों को इष्ट नहीं, प्रिय नहीं, मान्य नहीं, उसे छोड़ देना; और जो व्यवहार उनको अभीष्ट है, प्रिय है, मान्य है, जिसकी वे अनुमोदना करते हैं, उसे अंगीकार करना, भी उनकी पूजा करना है। धर्मादि को किसी भी प्रकार का नुकसान न हो; ऐसी यथोचित प्रवृत्ति करना भी उनके पूजन में समाविष्ट हो जाता है / क्योंकि श्रेष्ठ गुरुजन धर्म अनुकूल व्यवहार को ही हमेशा पसन्द करते हैं / उनको जो इष्ट है, वैसा करने से उनकी आत्मा प्रसन्न रहती है। गुरुजनों की आत्मा को चित्त को प्रसन्न रखना भी उनका श्रेष्ठ पूजन है // 114 / /
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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