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________________ 76 योगबिंदु आदर देना चाहिये / कलाचार्य-लिपि सिखाने वाला, अंग कसरत सिखानेवाला, काव्य प्रहेलिकादि, गुंथन, पाचन, गणित तथा अन्य प्रकार के उद्योग आदि सर्व प्रकार की कला सिखाने में जो निष्णात निपुण हो; उसे कलाचार्य कहते हैं। ऐसे कला शिक्षकों का भी श्रद्धा पूर्वक सम्मान करना चाहिये। उनके ज्ञातिलोगों का अर्थात् माता-पिता के सम्बन्धी उनके भाई-बहिनादि का, ज्ञानवृद्ध, वयोवृद्ध, चारित्रवृद्ध महापुरुषों का तथा मोक्षमार्ग का उपदेश देने वालों को अपना गुरुजन समझना चाहिये तथा उनकी सेवाभक्ति करना, आदर सत्कार करना, गौरव देना चाहिये / सन्त महात्माओं को गुरुवर्ग में यही अभीष्ट है अर्थात् सन्तों ने उपर्युक्त सभी गुणीजनों को गुरुकोटि में रखा है। अतः ऐसे आदर, बहुमान, गौरव योग्य सर्व पूज्यों की सेवाभक्ति, बहुमान करना ही सन्तों का उपदेश है // 110 // पूजनं चास्य विज्ञेयं, सन्ध्यं नमनक्रिया / तस्यानवसरेऽप्युच्चैश्चेतस्यारोपितस्य तु // 111 // अर्थ : तीनों काल वन्दन - नमस्कार करना इनका (गुरुवर्ग का) पूजन है। उनकी (गुरुजनों की) अनुपस्थिति में भी उनका नाम स्मरण करके, (अत्यन्त भाव पूर्वक) वन्दनादि करना चाहिये // 111 // माता-पिता आदि उन सर्व पूज्यों का पूजन तीन काल वन्दन, नमस्कार करना ही नहीं, जब उनके पास जाने का अवसर न हो, गुरुजन समीप में न हों-दूर हों, साक्षात दर्शन न करें, तो उनकी अनुपस्थिति में भी चित्त में उनका श्रद्धा पूर्वक ध्यान करके उनका चित्त में नाम स्मरण करके, तीनों (संध्या) काल-प्रातः, दुपहर और शाम के समय वन्दन नमस्कार, गुरुस्तुति आदि करनी चाहिये // 111 // अभ्युत्थानादियोगश्च, तदन्ते निभृतासनम् / नामग्रहश्च नास्थाने, नावर्णश्रवणं क्वचित् // 112 // अर्थ : (उन पूज्यों का) अभ्युत्थानादि से सत्कार करना और उनके पास अप्रगल्भता पूर्वक बैठना चाहिये / अयोग्य स्थान पर उनके नाम का ग्रहण और कभी भी उनके अवर्णवाद का श्रवण नहीं करना चाहिये // 112 // विवेचन : पूज्य गुरुजनों को अपने पास आते देखकर, शीघ्र उठकर सामने से उनको लेने जाना, आदरपूर्वक वन्दन-नमस्कार करना, योग्य आसन देना, सेवाभक्ति आदि करना, कार्यसेवा के लिये उनकी आज्ञा मांगनी / गुरुजन पास में बैठे हों तो शान्त, विनय पूर्वक बैठना चाहिये / असम्बन्धित, अप्रासंगिक तथा अहंकार जनित, गुरुजनों को पसन्द न हो, ऐसा नहीं बोलना चाहिये / अशुचि स्थानों - मलमूत्रादि के स्थानों पर उन पूज्यों का नाम नहीं लेना चाहिये / शुद्ध, पवित्र
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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