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________________ योगबिंदु उभयोस्तत्स्वभावत्वात् तदावर्तनियोगतः / युज्यते सर्वमेवैतन्नान्यथेति मनीषिणः // 105 / / अर्थ : उभय - पुरुष और प्रकृति दोनों का-तथाप्रकार का स्वभावादि सर्व चरम पुद्गलपरावर्त के सामर्थ्य से ही घटता है अन्यथा नहीं, ऐसा मनीषियों का कहना है // 105 // विवेचन : कुशलबुद्धि प्राप्त करना पुरुष का स्वभाव है और विविध परावर्तों में संसार का विस्तार करना प्रकृति का स्वभाव है / जब तक प्रकृति का अधिकार-सत्ता पुरुष से अलग नहीं हो जाता तब तक पुरुष को मोक्षानुगामिनी बुद्धि प्राप्त नहीं होती, और कुशल बुद्धि की प्राप्ति चरमपुद्गलपरावर्त में ही सम्भव है / चरम से अन्य पुद्गलपरावर्तों में सम्भव नहीं, इसलिये सभी मनीषियों का ऐसा कहना है // 105 // अथवा अर्थ : पुरुष और प्रकृति दोनों के अपने-अपने स्वभाव के कारण जीव संसार में परावर्त पाता है और अपने भिन्नत्व स्वभाव को प्रकट करके एक दूसरे से अलग भी हो जाते हैं यह बात अनेकान्तदृष्टि से विचारने पर घटती है, परन्तु एकान्तदृष्टि से बुद्धिमानों को घटती नहीं / विवेचन : पुरुष का अर्थ है आत्मा और प्रकृति का अर्थ है कर्मदल, इन दोनों का संयोग अनादि काल का है, परन्तु स्वभाव भिन्न-भिन्न है / एक चैतन्य स्वभाव वाला है दूसरा प्रकृतिरूपकर्मदलरूप जड़ स्वभाव वाला है। उन दोनों का जो अनादि कालीन संयोग है, वह आत्मा की उस प्रकार की योग्यता के कारण से है / उसी के कारण जीव भिन्न-भिन्न आवों में घूमता है। पूर्व में जिसका विवेचन कर चुके है श्रीकपिलदेव के सांख्यमत में वह सब प्रकृति से होता है, उनके मतानुसार जब तक प्रकृति अपने अधिकार से निवृत्त नहीं होती तब तक संसार में आवर्त अर्थात् परिभ्रमण चालू रहता है ऐसा जो कहा है यथार्थ घटित होता है, क्योंकि प्रकृति की निवृत्ति और पुरुष की कुशलबुद्धि की प्रवृत्ति चरमपुद्गलपरावर्त में ही प्रकट होती है। उसके बिना अध्यात्म की उपलब्धि नहीं होती ऐसा महामनीषियों ने बताया है // 105 // अत्राप्येतद् विचित्रायाः, प्रकृतेर्युज्यते परम् / इत्थमावर्तभेदेन, यदि सम्यग्निरूप्यते // 106 // अर्थ : यहाँ (पुरुष और प्रकृति के स्वभाव के सम्बन्ध में) यदि सम्यक् विचार करें तो प्रकृति की विचित्रता केवल उक्त प्रकार के आवर्तभेद से घटती है // 106 // विवेचन : पुरुष और प्रकृति का तथाप्रकार का स्वभाव प्रत्येक जीवात्मा में भिन्न-भिन्न
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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