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________________ 72 योगबिंदु ___ अर्थ : योग के विषय को जानने की इच्छा होने पर भी अनिर्धारित कितने ही जन्म बिताने पड़ते हैं, क्योंकि एकान्तरूप से जब तक पापक्षीण न हो जाय तब तक कुशलबुद्धि-मोक्षानुगामिनी बुद्धि प्राप्त नहीं होती // 10 // योग अध्यात्म को जानने की इच्छा होने पर भी, तामसिक और राजसिक वृत्तियों के पटल इतने प्रगाढ-जबरदस्त होते हैं कि, जब तक उनकी उग्रता, भयंकरता, प्रगाढ़ता को दूर न किया जाय तब तक कुशलबुद्धि-मोक्षमार्गपरायण बुद्धि प्राप्त नहीं होती / प्रकृतिजन्य उस गाढ़ आवरण को दूर करने के लिये टीकाकार ने कहा है कि अनिर्धारित-अनिश्चित-जिसकी संख्या निश्चित नहीं ऐसे, असंख्य जन्म-मरण धारण करने पड़ते हैं, क्योंकि पापमय भयंकर प्रवृत्तियों को सर्वथा क्षीण करने में उसे लम्बा काल व्यतीत हो जाता है। उस पापी प्रकृति पर विजय पाने के लिये जन्मोजन्म की साधना चाहिये। क्योंकि मैल जितना अधिक हो, उसे साफ करने में समय भी अधिक लगता है। इसलिये कहा है जिज्ञासा होना कठिन है और जिज्ञासा प्राप्त होने के पश्चात् ही अध्यात्म की उपलब्धि होती है। श्री गोपेन्द्रजी का मत और हमारे आप्त पुरुषों ने जो अध्यात्म की दुलर्भता बताई है, समान ही हैं, केवल उक्ति भेद हैं // 10 // ततस्तदात्वे कल्याणमायत्यां तु विशेषतः / मन्त्राद्यपि सदा चारु, सर्वावस्थाहितं मतम् // 104 // अर्थ : मंत्रादि सर्व अवस्था में सदैव चारु-सुन्दर स्वभावों वाले और हितावह होते हैं; इसी प्रकार कुशलबुद्धि उसके प्राप्तिकाल में और भविष्य में तो विशेष कल्याणकारक सिद्ध होती है // 10 // विवेचन : जैसे मणि, मंत्र आदि सर्व काल, सर्व अवस्था में हितकारक होते हैं / ज्योंज्यों चिन्तामणिरत्न और मंत्र आदि की आराधना, श्रद्धा-भक्ति से पूर्ण होकर, विधिपूर्वक करते हैं तो विशेष लाभदायक-हितकारक सिद्ध होती है / इसी प्रकार कुशलबुद्धि-मोक्षमार्गपरायणबुद्धि, उसकी प्राप्ति काल में प्राथमिक प्रथम अवस्था रूप में तो कल्याण कारक श्रेयमार्ग की तरफ ले जानेवाली होती ही है, परन्तु भविष्य में उसका उत्तरोत्तर विकास होता रहता हैं / परिणाम स्वरूप सम्यक्-दर्शन, ज्ञान और चारित्र, की आराधना अपनी चरम सीमा में पहुँच जाती हैं, और कर्ममल सर्वथा क्षीण होने पर आत्मा अपने सहजस्वभाव-आत्मस्वरूप रूपी उत्तम फल को प्राप्त करती है। तात्यर्य यह है कि कुशलबुद्धि प्रथम अवस्था में तो कल्याणकारी है ही; भविष्य में उसका उत्तरोत्तर विकास होने से विशेषकल्याण-मोक्षसुख को देने वाली भी होती है // 104 // इस प्रकार गोपेन्द्र आदि अन्य विद्वानों के मत को बताकर अब आगे वस्तु स्थिति को कहते हैं :
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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