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________________ योगबिंदु सत्व, राजस और तामस रूप त्रिगुणात्मक (प्रधान नामक) प्रकृति के सम्बन्ध से ही पुरुष अपने आत्म स्वरूप को भूल कर, 'मैं' और 'मेरे' में घिरा हुआ, संसार में विविध योनियों में, अवाच्य दुःखों को भोगता है। जब तक प्रकृति का जोर रहता है, पुरुष-जीव अपना भान भूल जाता है संसार में ही रचा-पचा रहता है / इसीलिये कहा है कि जब तक प्रकृति का जोर सर्वथा समाप्त नहीं होता पुरुष को इस तत्त्वमार्ग-योगमार्ग को जानने की इच्छा भी नहीं होती, तो फिर उसके अभ्यास की और उसकी प्राप्ति की तो बात ही क्या है। अन्य योगवेत्ता जिसे प्रकृति कहते हैं / जैन उसे ही मिथ्यादृष्टि कहते हैं। मिथ्यादृष्टि का सर्वथा अभाव चरमावर्त में होता है / कोई प्रकृति कहे, माया या कर्मों का जोर कहे सब एक हैं जब तक उस का जीव पर जोर होता है, जीव को मोक्ष मार्ग की तरफ रुचि ही नहीं होती। अन्तः करण की निर्मलता सभी को मान्य है // 101 // क्षेत्ररोगाभिभूतस्य, यथाऽत्यन्तं विपर्ययः / तद्वदेवास्य विज्ञेयस्तदावर्तनियोगतः // 102 // अर्थ : क्षेत्ररोग से पीड़ित व्यक्ति को जैसे मतिभ्रम हो जाता है वैसी ही स्थिति प्रकृति की सत्ता में उलझे हुये व्यक्ति की जानें // 102 / / विवेचन : योगी गोपेन्द्र के मतानुसार मनुष्य के उपर जब तामसिक और राजसिक प्रकृति के विकारों का जोर होता है, तब मनुष्य का ज्ञान नष्टप्रायः हो जाता है, जैसे किसी क्षेत्ररोग से पीड़ित व्यक्ति को मतिभ्रम हो जाने से रोग का यथार्थ सत्य हेतु समझ में नहीं आता और अनेक प्रकार के वहमों से सत्य से भ्रष्ट हो कर दुःखी होता है / अथवा जैसे किसी मनुष्य को किसी गांव विशेष में निवास करने के पश्चात् शरीर में कोई कोढ़ आदि रोग हो जाता है / तब अज्ञान दशा वाला जीव वहाँ खराब हवा है, मेरा इस गाँव के साथ कोई लेना-देना नहीं, इसीलिये मुझे अमुक रोग हुआ है, ऐसा मानता हुआ मतिभ्रम में पड़ा है, परन्तु कर्मदोष अथवा आहार की अशुद्धि का विचार ही नहीं करता इसी प्रकार जिस व्यक्ति पर प्रकृति के विकारों की सत्ता कायम है ऐसे प्रकृति-विकारों में दबे हये, उनमें उलझे हुये व्यक्तियों का ज्ञान नष्ट प्रायः होता है, क्योंकि उनके ज्ञान पर अत्यन्त कठिन आवरणों की काली घटाएँ छायी हुई होती है / इसलिये तत्त्वज्ञान को जानने की भी इच्छा पैदा नहीं होती। 'तदावर्तनियोगतः' का अर्थ टीकाकार ने “अनिवृत्त अधिकार वाली प्रकृति के व्यापार से" ऐसा लिया है अचरमपुद्गलपरावर्त नहीं // 102 // जिज्ञासायामपि ह्यत्र, कश्चित् सर्गो निवर्तते / नाक्षीणपाप एकान्तादाप्नोति कुशलां धियम् // 103 //
SR No.032246
Book TitlePrachin Stavanavli 23 Parshwanath
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHasmukhbhai Chudgar
PublisherHasmukhbhai Chudgar
Publication Year
Total Pages108
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size6 MB
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