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________________ |४२|| शिक्षण प्रक्रिया में सर्वांगपूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता __अच्छा होता कि विचारकों ने यह सोचा होता कि सामान्य दीख पड़ने वाले व्यक्तियों की प्रतिभा उभारी जा सकती है, उनके दृष्टिकोण संयम और उत्साह को बल दिया जा सकता है। साहस उभारा जा सकता है। चरित्र का धनी, अनुशासित, विवेकशील, ईमानदार, कर्मनिष्ठ जैसा सद्गुण संपन्न उन्हें बनाया जा सकता है। ___व्यक्तित्वों का निर्माण, राष्ट्र की, विश्व की, मानवता की महती आवश्यकता है। विशेषतया आज के अनास्था, अवांछनीयता एवं नैतिक अराजकता के वातावरण में पुराने मूल्यांकन, आधार और प्रचलन बदल गए, नई पीढ़ी की नई संस्कृति ने जड़ पकड़ी। इसमें प्रामाणिकता और प्रखरता अपनाने के लिए अभिरुचि रह नहीं गई। उसी का प्रतिफल है कि व्यक्ति और समाज को अनेकानेक समस्याएँ उलझन में डाले हुए हैं। अनेकानेक संकट सहने पड़ रहे हैं। इनका समग्र समाधान तब तक नहीं निकल सकता, जब तक कि जन साधारण को मानवीय गरिमा के अनुरूप अपना दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप ढालने के लिए सहमत-तत्पर न किया जाए। यह महती आवश्यकता है। इस बुद्धिवाद के युग में इस घेरे में लोक मानस को अनुशासित करने के लिए ऐसे प्रतिपादनों की आवश्यकता है, जो तर्क, तथ्य, प्रमाण और उदाहरणों से भरा-पूरा हो, पर अभी ऐसा कुछ क्रमबद्ध नहीं है, न प्रतिपादन न प्रशिक्षण। इस अभाव को दरिद्रता के समतुल्य, तत्काल सुलझाए जाने योग्य समस्या माना जाना चाहिए। इस संदर्भ में ऐसा प्राणवान क्रमबद्ध साहित्य सृजा जाए, जिसमें समय की प्रवृत्तियों, मान्यताओं को उत्कृष्टता की दिशा में भेजने के लिए ऐसा प्राण विद्यमान हो जो उलटे को उलटकर सीधा कर सके। इसके निमित्त विज्ञजनों को आवश्यक सामग्री प्रचुर मात्रा में एकत्रित करनी चाहिए। इस संग्रह के निमित्त युद्ध स्तर पर कार्य होना चाहिए। इतना गोला-बारूद संग्रह किया जाए, जिससे प्रस्तुत अवांछनीयता का दुर्ग विस्मार किया जा सके। अच्छा हो इस प्रयोजन को एक स्वतंत्र विज्ञान माना जाए। उसे शिक्षा का अंग रखा जाए। साथ ही अतिरिक्त विश्वविद्यालय जैसा
SR No.032174
Book TitleShikshan Prakriya Me Sarvangpurna Parivartan Ki Avashyakta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreeram Sharma, Pranav Pandya
PublisherYug Nirman Yojna Vistar Trust
Publication Year2011
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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