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________________ विकारः ऋतु आनेवाले की विधि छोडा और आजही भाषाटीकोपेतः। चन्न्न्न्न्न न्न्न् शीत तथा वर्षामें मीठे, खट्टे और नमकीन पदार्थ, वसन्त- गौड़ाधिनाथ (नयपाल नामक नृपति) के पाकशालाके में कटु, तिक्त और कषैले पदार्थ, ग्रीष्ममें मीठे और | आधिकारी तथा प्रधान मंत्री नारायणके पुत्र सुनीतिज्ञ तथा ऋतुमें मीठे तिक्त तथा कषैले पदार्थ सेवन करना चाहिये । अन्तरङ्ग पदवी प्राप्त भानुके छोटे भाई, प्रसिद्ध लोध्रवंशमें उत्पन्न | संक्षेपतः अन्नपान बताया है । इसके विपरीत हानिकर श्रीचक्रपाणिजीने यह ग्रन्थ बनाया है। जो पुरुष (वृन्दप्रणीत)सिद्ध झना चाहिये । नित्य सभी रसोंका सेवन करना चाहिये । पर योगसे अधिक लिखे गये इस ग्रंथके योगोंको सिद्ध योगमें ही मिला दे ने अपने ऋतुम अपने अपने रसकी अधिकता होनी चाहिये। (सिद्धयोगके ही सब योग बता दे ) अथवा इस ग्रंथसे ही ऋतुओंके मध्यके दो सप्ताह (बीतते हुए ऋतुका अन्तिम | निकाल दे, उसके ऊपर भत्रय (कारिका, बृहट्टीका, चन्द्रटीका) और आनेवाले ऋतुका प्रथम सप्ताह ) "ऋतुसन्धि" कहा| और ऋग्यजुःसामरूप तीनों वेदोंके जाननेवालेको शाप पड़े ॥२॥ है। उसमें क्रमशः पूर्वकी विधि छोड़नी और आगेकी विधि इति श्रीमन्महामहिम-चरकचतुरानन-चक्रपाणिप्रणीतः ग करनी चाहिये । यह ऋतुसात्म्य चेष्टा और आहारके चिकित्सासारसंग्रहापरनामकःचक्रदत्तः समाप्तः । सार बताया और जो अभ्यास होनेके कारण सदा लाभ ही| ना है, उसे "ओकसात्म्य" कहते हैं ॥ ४१-४५ ॥ टीकाकारपरिचयः। उपसंहारः। उन्नाम ( उन्नाव) नामास्ति विशालमण्डलं देशानामामयानां च विपरीतगुणं गुणैः । ग्रामः पटीयानि (पटियांरां)ति तत्र विश्रुतः । "मिच्छन्ति सात्म्यज्ञाश्चेष्टितं चाद्यमेव च ४६ तत्राभवद् भूरितपा महात्मा यो वाजपेयीत्युपमन्युवंश्यः॥१॥ यं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येनानुवर्तते । र हाथ श्रीद्वारकानाथ इति प्रसिद्धः हना विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत् ॥४७॥ पुत्रस्तदीयोऽयमतीव नम्रः । रस्येव रथस्येव रथी यथा । ' श्रीयादवाद्वैद्यगणप्रपूजितावंशरीरस्य मेधावी कृत्येष्ववहितो भवेत् ॥ ४८॥ दधीत्य वेदं खिलनित्यगस्य ॥२॥ और रोगोंके गुणोंसे विपरीत गुणयुक्त कर्म तथा भोजन श्रीविश्वनाथस्य प्रिया प्रसिद्धा त्म्यि" कहे जाते हैं। उस विधिका नित्य प्रयोग करना चाहिये, काशीपुरी येन सुशोभतेऽद्य । उसे स्वास्थ्यकी प्राप्ति हो और अनुत्पन्न रोग उत्पन्न ही न हों। श्रीविश्वविद्यालयनामकोऽस्ति प्रकार नगरका स्वामी नगरके कार्योंमें तथा रथका स्वामी विद्यालयो विश्वविलब्धकीर्तिः ॥३॥ के विषयमें सावधान रहता है, उसी प्रकार बुद्धिमान् मनुष्यको यत्स्थापको विदितविश्वजनीनवृत्तो ने शरीरकी रक्षाके लिये सावधान रहना चाहिये ॥४६-४८॥ विच्छिन्नधर्मपथशुद्धिधृतावतारः । इति स्वस्थवृत्ताधिकारः समाप्तः । श्रीहिन्दुमानपरिरक्षणवर्द्धनोक्तः पूज्यः सतां मदनमोहनमालवीयः॥४॥ ग्रन्थकारपरिचयः। गौडाधिनाथरसवत्याधिकारिपात्र अध्यापने तेन नियोजितोऽयं नारायणस्य तनयः सुनयोऽन्तरङ्गात् । वैद्यो जगन्नाथप्रसादशर्मा । भानोरनुप्रथिवलोध्रवलीकुलीन: विशोधयन्निर्मितवान्सुबोधिनी श्रीचक्रपाणिरिह कर्तृपदाधिकारी ॥१॥ श्रीचक्रदत्तस्य गतार्थटीकाम् ॥५॥ यः सिद्धयोगलिखिताधिकसिद्धयोगा रामाष्टाङ्कमृग काब्दे व्यासपूजनवासरे। नत्रैव निक्षिपति केवलमुद्धरेद्वा । पूर्तिमाप्ता यतस्तस्मादर्पिता गुरुहस्तयोः ॥६॥ भट्टत्रयत्रिपथवेदविदा जनेन इति श्रीमदायुर्वेदाचार्यपण्डितजगन्नाथप्रसादशर्मणा प्रणीता सुबोधिन्याख्या चक्रदत्तस्य व्याख्या समाप्ता। दत्तः पतेत्सपदि मूर्धनि तस्य शापः॥२॥ -- पुस्तक मिलनेका ठिकानागङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, खेमराज श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" स्टीम्-प्रेस, "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम्-प्रेस, कल्याण-बम्बई. खेतवाडी-बम्बई.
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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