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________________ विकारः] . भाषाटीकोपेतः। - स्नान, सुगन्धयुक्त पदार्थोंका उपयोग, उत्तम वेष, विमलवस्त्र | गोधूमपिष्टमांसेक्षुक्षीरोत्थविकृती ॥१९॥ तथा सदा रत्न, सिद्धमन्त्र तथा औषधियां धारण करना | नवमन्नं वसां तैलं शौचकार्ये सुखोदकम् , चाहिये ॥६-१२॥ युक्त्यार्ककिरणान्स्वदं पादत्राणं च सर्वदा ॥ एका सामान्यनियमाः। प्रावाराजिनकौशेयप्रवेणीकुथकास्तृतम् । सातपत्रपदत्राणो विचरेद्युगमात्रदृक् । उष्णस्वभावैर्लघुभिः प्रावृतः शयनं भजेत् ॥ २१ ॥ निशि चात्ययिके कार्ये दण्डी मौली सहायवान् १३ अङ्गारतापसंतप्तगर्भभूवेश्मनि प्रियाम् । जीर्णे हितं मितं चाद्यान्न वेगानीरयेद्वलात् । । । पीवरोरुस्तनश्रोणीमालिङ्गयागुरुचर्चिताम् ।। २२ ॥ न वेगितोऽन्यकार्य:स्यान्नाजित्वा साध्यमामयम् १४| हेमन्तऋतु में बलवान् पुरुषका अग्नि शीतसे ढके रहनेके कारण दशधा पापकर्माणि कायवाङ्मानसैस्त्यजेत् । बलवान होता है । इसलिये इस ऋतु (मार्गशीर्ष, पौष ) में काले हितं मितं यादविसंवादि पेशलम् ।। १५ । चिकने, मीठे. खट्टे और नमकीन रसोंका सेवन करना चाहिये। आत्मवत्सततं पश्येदपि कीटपिपीलिकाम् । अतः गेहूँ, उड़दकी पिट्ठी, मांस, ईख और दूधसे बने पदार्थ, आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।। १६॥ नवीन अन्न, चर्बी तथा तैलका अधिक उपयोग करना चाहिये । नदिनानि मे यान्ति कथंभूतः संप्रति । तथा युक्ति ( जहां तक सहन हो तथा सूर्यकी ओर दुःखभाङ् न भवत्येवं नित्यं सन्निहितस्मृतिः।।१७।।। पीठ कर ) से सूर्यकी धूपमें घूमना चाहिये । और शौचादिके जूता पहिन तथा छाता लेकर बाहर जाना चाहिये । तथा| लिये गरम जलका उपयोग करना चाहिये। अग्नि तापनी चार हाथ आगे देखकर चलना चाहिये। रात्रिमें आवश्यक | चाहिये । पैरोंको सदा गरम रखना चाहिये । गद्दा, मृगचर्म, कार्य होने पर ही जाना चाहिये । तथा हाथमें दण्डा रखना | रेशमी वस्त्र, रेडी या कम्बल बिछी शय्यापर गरम स्वभाववाले चाहिये। शिरमें साफा बांधकर जाना चाहिये। और सहायक तथा हल्के वस्त्र ओढकर सोना चाहिये । अंगीठी रखकर गरम साथमें रखना चाहिये । अन्न पच जानेपर ही हितकारक तथा किये हुए कमरों में गर्भगृह तथा भूगृहमें शय्या (चारपाई) बिछाना मात्रामें भोजन करना चाहिये । वेगोंको बलपूर्वक न निका-1 चाहिये ।तथा अगुरुसे लिप्त स्थूल ऊरु, कुच तथा कमरयुक्त प्रियाका आलिंगन कर सोना चाहिये ॥ १९-२२॥ लना चाहिये । तथा वेग उपस्थित होनेपर उससे निवृत्त होकर | ही दूसरा काम करना चाहिये । तथा साध्य रोगकी उपेक्षा न शिशिरचर्या । करनी चाहिये । सब कामोंको छोड़कर सर्व प्रथम रोगनिवृत्तिका ___ अयमेव विधिः कार्यः शिशिरेऽपि विशेषतः। उपाय करना चाहिये। शरीर, मन तथा वाणसे दश प्रकार तदा हि शीतमधिकं रोक्ष्यं चादानकालजम्॥२३॥ (हिंसा, चोरी, व्यर्थका काम, दूसरेका बुरा चाहना, चुगली, शिशिरऋतु में भी यही विधि सेवन करनी चाहिये । उस कठोर शब्द कहना, झूठ बोलना, असम्बद्ध प्रलाप, ईष्या, दुःख समय शीत अधिक होता है। और आदान कालजन्य रूक्षता बढ देना, बुरे भावसे देखना.) के पाप त्याग देने चाहियें। तथा जाती है. अतः अधिक उष्ण तथा स्निग्ध आहार विहार सेवन समयपर हितकारक थोड़ा, मधुर, तथा सन्देहरहित बोलनासा चाहिने चाहिये । अपने ही समान दूसरे यहां तक कि कीड़े तथा चीटि वसन्तचर्या । योंको भी जानना चाहिये । जो दूसरेका व्यवहार अपनेको बुरा लगे वह दूसरोंके साथ नहीं करना चाहिये । मेरे रात दिन किस कफश्चितो हि शिशिरे वसन्तेऽकौशुतापितः । प्रकार बीतते हैं, इसका ध्यान रखनेवाला कभी दुःखी नहीं होता, हत्वाग्निं कुरुते रोगांस्ततस्तत्र प्रयोजयेत् ॥२४॥ क्योंकि उसकी स्मरणशक्ति ताजी रहती है । तथा बेकार नहीं। तीक्ष्णं वमननस्याद्यकवलग्रहमञ्जनम् । रहता ॥ १३-१७ ॥ व्यायामोद्वर्तनं धूमं शौचकार्ये सुखोदकम् ॥२५॥ ऋतुचर्याविधिः। स्नातोऽनुलिप्तः कर्पूरचन्दनागुरुकुकुमैः । मासैर्द्विसंख्यैर्माघाद्यैः क्रमात्षतवः स्मृताः।। पुराणयवगोधूमक्षौद्रजाङ्गलशूल्यभुक् । शिशिरोऽथ वसन्तश्च ग्रीष्मवर्षाशरद्धिमाः ॥१८॥ प्रपिबेदासवारिष्टसीधुमार्तीकमाधवान् ॥२६॥ माघादि दो दो महीनोंसे ६ ऋतु होते हैं । उनके नाम| वसन्तेऽनुभवेत्स्त्रीणां काननानां च यौवनम् । क्रमशः शिविर, वसन्त, प्रीष्म, वर्षा, शरद् तथा हेमन्त हैं॥१८ गुरूष्णस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ॥२७॥ हेमन्तचर्याविधिः। शिशिरऋतुमें सञ्चित हुआ कफ वसन्त ऋतु में सूर्यको किरणोंसे बलिनः शीतसंरोधाद्धेमन्ते प्रबलोऽनलः । तपनेसे पिघलकर अग्नि मंद करता हुआ अनेक रोग उत्पन्न कर सेवेतातो हिमे स्निग्धस्वाइम्ललवणान् रसान् । देता है । अतः इस ऋतुमें तीक्ष्ण, वमन, नस्य, कालमह,
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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