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________________ विकारः] मापाटीकोपेतः। दंशसे चार अङ्गुल ऊपर वस्त्र या रस्सी आदिसे बांधना | द्विपलं नतकुष्ठाभ्यां घृतक्षोंद्र चतुष्पलम् । ( तथा मन्त्रद्वारा बान्ध देना) मन्त्र, विषनाशक प्रयोग तथा अपि तक्षकदष्टानां पानमेवत्सुखप्रदम् ॥८॥ काटनेवाले सर्पको ही पकड़कर काट देना और यदि सर्प न मिले, वन्ध्याकर्कोटजं मलं छागमूत्रेण भावितम् । तो मुलायम फलोंको दांतोंसे काटकर फेंकनेसे सर्पविष। नस्य काञ्जिकसंयुक्तं विषोपहतचेतसः ॥ ९ ॥ शान्त होता है ॥१॥ सांपके काटे हुएको गृहधूम, हल्दी, दारुहल्दी, व समूल प्रत्यङ्गिरामूलयोगाः। |चौराईके कल्कमें घी व दही मिलाकर पिलाना चाहिये । तथा मूलं तण्डुलवारिणा पिबति यः प्रत्याङ्गिरासम्भवं |परवलकी जड़के . चूर्णके नस्यसे काले सांपसे काटा भी जी परवलकी जड़के चूर्णके नस्यसे काल जाता है। तथा मुखके कफ अथवा कानके मैलको वाम हाथनिस्पिष्टं शुचि भद्रयोगदिवसे तस्याहिभीतिः कुतः। की अनामिका अंगुलीसे लेकर दंशपर लेप करने तथा मनुष्यदर्पादेव फणी यदा दशति तं मोहान्वितो मूलपं मुत्रका सिञ्चन करनेसे सर्पविष नष्ट होता है । तथा सिरसाके स्थाने तत्र स एव याति नियतं वर्क यमस्याचिरात्॥२॥ फलोंके स्वरसमें भावित सफेद सरसोंका चूर्ण कर पान, नस्य व जो मनुष्य कण्टकिशिरीषको जड़के चूर्णको चावलके जलके अजनके लिये सांपके काटे हए मनुष्योंको ७ दिनतक प्रयोग साथ आषाढ़ मासमें उत्तम नक्षत्रादियुक्त दिनमें पीता है, करना चाहिये। तथा तगर व कूठका मिलित चूर्ण ८ तो. उसको सर्पका कोई भय नहीं रहता । यदि कोई सांप दपसे उसे और शहद व घी मिलित १६ तोला मिलाकर पीनेसे तक्षकसे काटही ले, तो तुरन्त उसी स्थानमें वह सर्प ही मर काटा हुआ भी सुखी होता है । तथा वांझखेखसाकी जड़ वकजाता है ॥२॥ रेके मूत्रमें भावित कर काजीमें मिलाकर विषसे बेहोश मनुष्यको निम्बपत्रयोगः। नस्य देना चाहिये ॥५-९॥ मसूरं निम्बपत्राभ्यां खादेन्मेषगते रवी। महागदः। अब्दमेकं न भीतिः स्याद्विषात्तस्य न संशयः ॥३॥ त्रिवृद्विशाले मधुकं हरिद्रे जो मनुष्य मेषके सूर्यमें मसूरकी दालको नीमकी पत्तीके शाकके साथ खाता है, उसे एक वर्षतक विषसे कोई भय नहीं मजिष्ठवगा लवणं च सर्वम् । होता ॥३॥ कटुत्रिकं चैव विचूर्णितानि शृङ्गे निदध्यान्मधुना युतानि ॥ १०॥ पुनर्नवायोगाः। एषोऽगदो हन्त्युपयुज्यमानः धवलपुनर्नवजटया तण्डुलजलपीतया च पुष्य: । । । पानाञ्जनाभ्यञ्जननस्ययोगः। अपहरति विषधरविषोपद्रवमावत्सरं पुंसाम् ॥४॥ अवार्यवीर्यो विषवेगहन्ता सफेद पुनर्नवाकी जड़को पुष्यनक्षत्रमें चावलके जलके साथ महागदो नाम महाप्रभावः ॥११॥ पीस मिलाकर पीनेसे एक वर्षतकके लिये सर्पके विषके भयको दूर रखता है ॥ ४ ॥ निसोथ, इन्द्रायण, मौरेठी, हल्दी, दारुहल्दी, मजिष्ठादिगण की औषधियां, समस्त नमक व त्रिकटु सब महीन पीस कपसर्पदष्टचिकित्सा। | उछान कर शहद मिलाकर सीङ्गकी शीशीमें धरना चाहिये । गृहधूमो हरिद्रे द्वे समूलं तण्डुलीयकम् । | यह पीने, अञ्जन, नस्य तथा मालिशसे विषके वेगको नष्ट करता अपि वासुकिना दष्टः पिबेदधिघृताप्लुतम् । है। इसका प्रभाव अनिवार्य होता है। यह महाप्रभावशाली कूलिकामूलनस्येन कालदष्टोऽपि जीवति ॥ ५॥ “महागद " नामसे कहा जाता है ॥ १० ॥११॥ श्लेष्मणः कर्णगूथस्य वामानामिकया कृतः। विविधावस्थायां विविधा योगा। लेपो हन्याद्विषं घोरं नृमूत्रासेचनं तथा ॥६॥ पीते विषे स्याद्वमनं च त्वक्स्थे। शिरीषपुष्पस्वरसे भावितं श्वेतसर्षपम् । प्रदेहसेकादि सुशीतलं च ॥१२॥ सप्ताहं सर्पदष्टानां नस्यपानाञ्जने हितम् ॥७॥ कपित्थमामं ससिताक्षौद्रं कण्ठगते विषे। १ काटनेवाले सापको ही काट खाना या मुलायम फल या| लिह्यादामाशयगते ताभ्यां चूर्णपलं नतात् ॥ १३ ॥ मिट्टीका ढेला था कंकड़ आदिको दांतोंसे काटकर फेंकना सुश्रु विषे पक्काशयगते पिप्पलीरजनीद्वयम् । तमें भी हितकर बताया है। मजिष्ठां च समं षिष्ट्वा गोपित्तन नरः पिबेत् ॥१४॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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