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________________ विकारः] भाषाटीकोपेतः। न्न्न्नन्न्न्न्न्न्च्चन्न्न्न्न काथ" है । इसको शक्करके साथ पीनेसे त्रिदोषजमसूरिका, ज्वर प्रलेपः। तथा विसर्प जनित मसूरिकाएं नष्ट होती हैं। जी उठती हुई सौवीरेण तु संपिष्टं मातुलुङ्गस्य केशरम् ॥ २७ ॥ मसरिका दब जाती है, उसे फिर निकाल देता है। १९-२१॥ प्रलेपारपातयत्याशु दाहं चाशु नियच्छति। पटोलादिकाथः। बिजौरे निम्बूकी केशरको काजीके साथ पीसकर लेप करनेसे दाह अवश्य नष्ट होता है तथा मसुरिकाओंकी पपड़ी गिर पटोलकुण्डलीमुस्तवृषधन्वयवासकैः । जाती है ॥२७॥ भूनिम्बनिम्बकटुकापर्पटैश्च शृतं जलम् ॥ २२॥ मसूरी शमयेदामा पकां चैव विशोषयेत् । पादपिडकाचिकित्सा। नातः परतरं किञ्चिद्विस्फोटज्वरशान्तये ॥ २३ ॥ पाददाहं प्रकुरुते पिडका पादसंभवा ॥२८॥ तत्र सेकं प्रशंसन्ति बहुशस्तण्डुलाम्बुना । परवलकी पत्ती, गुर्च, नागरमोथा, अडूसा,यवासा,चिरायता, भीमकी छाल, कुटकी, तथा पित्तपापड़ाका काथ आम (अपक्क) पैरोंमें पिड़का उत्पन्न होकर दाह करती है, उसमें चावलके जलका सिञ्चन हितकर है ॥२८॥मसूरीको शान्त करता, तथा पक्कको सुखाता है। इससे बढ़कर फफोले तथा ज्वरको शान्त करनेवाला दूसर कोई श्रेष्ठ प्रयोग पाकावस्थाप्रयोगा। नहीं है ॥ २२ ॥ २३ ॥ पाककाले तु सर्वास्ता विशोषयति मारुतः ॥२९॥ अन्यत्पटोलादिद्वयम् । तस्मात्संबृंहणं कार्य न तु पथ्यं विशोषणम् । गुडुची मधुकं द्राक्षा मोरटं दाडिमैः सह ॥ ३०॥ पटोलमूलारुणतण्डुलीयकं पालकाले तु दातव्यं भेषजं गुडसंयुतम् । पिबद्धरिद्रामलकल्कसंयुतम् । तेन पाकं व्रजत्याशु न च वायुः प्रकुप्यति ॥३१॥ मसूरिकास्फोटविदाहशान्तये लिहेद्वा बादरं चूर्ण पाचनार्थ गुडेन तु । तदेव रोमान्तिवमिज्वरापहम् ॥२४॥ अनेनाशु विपच्यन्ते वातपित्तकफात्मिकाः॥ ३२॥ पटोलमूलारुणतण्डुलीयकं तथैव धात्रीखदिरेण संयुतम् । . पाककालमें सभी प्रकारकी मसूरिकाओंको वायु सुखा देता है, अतः सभीमें बृहण चिकित्सा हितकर होती है, शोषण नहीं। पिबेजलं सुकथितं सुशीतलं अतः गुर्च, मोरेठी, मुनक्का, इक्षुमूल तथा अनारदानाके चूर्णको मसूरिकारोगविनाशनं परम् ॥२५॥ | गुड़के साथ पाकके समय देना चाहिये। इससे मसूरिकाएँ पक (परवलकी जड़ व लाल चौराईका काथ, हल्दी व आंवलेके जाती हैं, वायु नहीं बढ़ती । अथवा पकानेके लिये बेरका चूर्ण कल्कके साथ मसूरिका, फफोले, जलन, ज्वर, रोमान्तिका व गुड़के साथ खाना चाहिये । इससे वातपित्त कफात्मक मसुरिकाएँ वमनको नष्ट करता है। तथा (२) परवलकी जड़, लाल चौराईका शीघ्र ही पक जाती हैं ॥२९-३२॥ काथ, आंवला व कत्थेके कल्कके साथ ठण्ढ़ा कर पीनेसे मसूरिका विविधास्ववस्थासु विविधा योगाः। रोग नष्ट होता है ॥ २४ ॥ २५ ॥ खदिराष्टकः। शुलाध्मानपरीतस्य कम्पमानस्य वायुना । खदिरत्रिफलारिष्टपटोलामृतवासकैः । धन्वमांसरसाः शस्ता ईषत्सैन्धवसंयुताः ॥ ३३ ॥ काथोऽष्टकाङ्गो जयति रोमान्तिकमसूरिकाः । दाडिमाम्लरसैर्युक्ता यूषाः स्युररुचौ हिताः । पिबेदम्भस्तप्तशीतं भावितं खादिराशनैः ॥३४॥ कुष्ठवीसर्पविस्फोटकण्ड्वादीनपि पानतः ॥२६॥ शौचे वारि प्रयुजीत गायत्रीबहुवारजम् । कत्था, त्रिफला, नीमकी पत्ती, परवलकी पत्ती, गुर्च तथा जातीपत्रं समजिष्ठं दापूिगफलं शमीम् ॥३५॥ अहसाका क्वाथ रोमान्तिका मसूरिका, कुष्ठ, विसर्प, विस्फोट, धात्रीफलं समधुकं कथितं मधुसंयुतम् । खुजली आदिको नष्ट करता है ॥ २६ ॥ मुखरोगे कण्ठरोगे गण्डूषार्थ प्रशस्यते ॥३६॥ अमृतादिकाथ। अक्ष्णोः सेकं प्रशंसन्ति गवेधुमधुकाम्बुना । अमृतादिकषायस्तु जयेत्पित्तकफात्मिकाम् ।। मधुकं त्रिफला मूर्वा दारूत्वङ् नीलमुत्पलम्॥३७॥ भमृतादि काथ पित्तकफात्मक मसूरिकाको नष्ट करता है।। उशीरलोध्रमजिष्ठाः प्रलेपाश्च्योतने हिताः
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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