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________________ विकारः] मापाटीकोपेतः। (२१५) - - - . भूसीरहित यव, अइसा तथा आंवलेका काढ़ा, दालचीनी, और शहदके साथ पीनेसे ज्वर, वमन व अम्लपित्तको तेजपात व इलायचीका चूर्ण तथा शहद मिलाकर पीनेसे | नष्ट करता है ॥११॥ तथा मूंगकी दालके साथ भोजन करनेसे अम्लपित्त नष्ट होता पथ्यादिचूर्णम् । है॥५॥ पथ्याभृङ्गरजश्चूर्ण युक्त जीर्णगुडेन तु । शृंगवेरादिकाथः। जयेदम्लपित्तजन्यां छर्दिमन्नविदाहजाम् ॥ १२॥ कफपित्तवमीकण्डूज्वरविस्फोटदाहहा । छोटी हर्र व भांगरेका चूर्ण पुराने गुड़के साथ अम्लपित्त पाचनो दीपनः काथः शृङ्गवेरपटोलयोः ॥६॥ |तथा अन्नविदाहजन्य छर्दिको नष्ट करता है ॥ १२॥ अदरख व परवलका क्वाथ कफपित्तज वमन, खुजली, ज्वर, वासादिगुग्गुलुः । फफोले, व दाहको नष्ट करता, पाचन तथा दीपन है ॥ ६ ॥ वासानिम्बपटोलत्रिफलाशनयासयोजितो जयति । पटोलादिक्वाथः। अधिककफमम्लपित्तं प्रयोजितो गुग्गुलुः क्रमेण १३ पटोलं नागरं धान्यं काथयित्वा जलं पिबेत् ।। अडूसा, नीमकी छाल, परवल, त्रिफला तथा विजैसार कण्डपामातिठालनं कफपित्तानिमान्दाजित ॥७॥युक्त गुग्गुलु क्रमशः आंधककफयुक्त अम्लपित्तको नाम कण्डूपामातिशूलघ्नं कफपित्ताग्निमान्द्यजित् ॥७॥| युक्त परवल, सोंठ व धनियांका क्वाथ पीनेसे खुजली, पामा, कफ,। करता है ॥१३॥ पित्त व अनिमान्यको नष्ट करता है॥७॥ विविधा योगाः। अपरः पटोलादिः। छिन्नाखदिरयष्टयाह्वदाय॑म्भो वा मधुद्रवम् । पटोलविश्वामृतरोहिणीकृतं सद्राक्षामभयां खादेत्सझौद्रां सगुडां च ताम् १४॥ जलं पिबेत्पित्तकफोच्छ्रये तु । कटुका सितावलेह्या पटोलविश्वं च क्षौद्रसंयुक्तम् । शूलभ्रमारोचकवह्निमान्द्य रक्तस्रुतौ च युक्त्या वा खण्डकूष्माण्डकं श्रेष्ठम् १५ दाहज्वरच्छर्दिनिवारणं तत् ॥ ८॥ गुर्च, कत्था, मौरेठी व दारुहल्दीके क्वाथको शहदके साथ अथवा हरड़के चूर्णको मुनक्का, शहद व पुराने गुड़के सात परवल, सोंठ, गुर्च तथा कुटकीका क्वाथ पित्तकफाधिक अथवा परवल तथा सोंठके चूर्णको शहदके साथ खानेसे अम्लअम्लपित्तमें देना चाहिये। यह शूल, भ्रम, अरोचक, अग्निमान्ध, पित्त दूर होता है । तथा रक्त गिरनेपर खण्डकूष्माण्डका प्रयोग दाह, ज्वर, और वमनको नष्ट करता है ॥ ८॥ | उत्तम है॥ १४ ॥१५॥ अपरो यवादिः। अपर पटोलादिः। यवकृष्णापटोलानां काथं क्षौद्रयुतं पिबेत् । पटोलधन्याकमहौषधाब्दैः नाशयेदम्लपित्तं च अरुचिंच वमिं तथा ॥ ९॥ कृतः कषायो विनिहन्ति शीघ्रम् । थव, छोटी पीपल व परवलके क्वाथको शहद मिलाकर मन्दानलं पित्तबलासदाहपीनेसे अम्लपित्त, असाच तथा वमन मष्ट होता है॥९॥ च्छर्दिज्वरामानिलशुलरोगान् ॥ १६॥ वासादिकाथः। परवल, धनियां, सोंठ तथा नागरमोथाका काथ शीघ्र ही मन्दाग्नि, पित्त, कफ, दाह, वमन, ज्वर, आमवात और शुल वासामृतापर्पटकनिम्बभूनिम्बमार्कवैः। | आदि रोगोंको नष्ट करता है ॥ १६ ॥ त्रिफलाकुलकः काथः सक्षौद्रश्वाम्लनाशनः ॥१०॥ गुडूच्यादिकाथः। अडूसा, गुर्च, पित्तपापड़ा, नीमकी छाल, चिरायता, भांगरा, त्रिफला तथा परवलका काथ शहदके साथ लेनेसे। छिन्नोद्भवानिम्बपटोलपत्रं अम्लपित्तको नष्ट करता है ॥१०॥ ___ फलत्रिकं सुक्कथितं सुशीतम् । क्षौद्रान्वितं पित्तमनेकरूपं फलत्रिकादिकाथः। सदारुणं हन्ति हि चाम्लपित्तम ॥१७॥ फलत्रिकं पटोलं च तिक्ताकाथः सितायुतः। । गुर्ज, नीमकी छाल, परवलकी पत्ती.तथा त्रिफलाका काथ पीतः छीतकमध्वात्तो ज्वरच्छद्यम्लपित्तजित्॥११॥ बनाय ठण्डा होनेपर शहद मिलाकर पीनेसे अनेक प्रकारका त्रिफला, परवल तथा कुटकीका काढ़ा, मिश्री, मौरेठी पित्तरोग तथा अम्ल पित्त नष्ट होता है ॥ १७ ॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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