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________________ (१८०) पक्रदत्तः। [प्लीहा दशमूल २॥ सेरका काथ, पञ्चकोल प्रत्येक १ पल, जवा- दूध ८ प्रस्थ, थूहरका दूध १ पल और निसोथका कल्क ६ पल खार १ पल, गायका घी अछुढ़क तथा दहीका तोड़ १ आढ़क मिलाकर सिद्ध किया गया घृत पीना चाहिये ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ मिलाकर यथाविधि पाक हो जानेपर सेवन करनेसे उदर तथा गुल्मरोग नष्ट होते हैं ॥ ५९ ॥ नाराचघृतम् । स्नुकक्षीरदन्तीत्रिफलाविडङ्गचित्रकघृतम् । सिंहीत्रिवृच्चित्रककल्कयुक्तम् । चतुर्गुणे जले मूत्रे द्विगुणे चित्रकात्पले । घृतं विपक्कं कुडवप्रमाणं कल्के सिद्धं घृतप्रस्थं सक्षारं जठरी पिबेत् ॥६०nj __ तोयेन तस्याक्षमथार्धकर्षम् ॥ ६७ ॥ घी १ प्रस्थ, गोमूत्र २ प्रस्थ, जल ४ प्रस्थ तथा चीतकी पीत्वोष्णमम्भोऽनु पिबेद्विरिक्ते जड़ २ पल मिलाकर सिद्ध किये गय घृतमें जवाखार मिलाकर पेयां सुखोष्णां वितरेद्विधिज्ञः । पीनेसे उदररोग नष्ट होता है ॥६ ॥ नाराचमेतज्जठरामयानां बिन्दुघृतम् । युक्त्योपयुक्तं शमनं प्रदिष्टम् ।। ६८ ॥ थूहरका दूध, दन्ती, त्रिफला, वायबिडङ्ग, छोटी कटेरी, अर्कक्षीरपले द्वे च स्नुहीक्षीरपलानि षट् । ...निसोथ तथा चीतकी जड़का कल्क और एक कुड़व घृत चतुपथ्याकाम्पल्लक:श्यामासम्पाकं गिरिकर्णिका॥६॥ण जलमें छोडकर एक पाक करना चाहिये । इसका एक नीलिनी त्रिवृता दन्ती शंखिनी चित्रकं तथा। कर्ष अथवा अर्धकर्ष गरम जलके साथ पीना चाहिये । इससे एतेषां पलिकैर्भागघृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ६२॥ विरेचन हो जानेपर कुछ गरम गरम पेया देनी चाहिये । इस अथास्य मलिने कोष्ठे बिन्दुमात्रं प्रदापयेत्। “ नाराचघृत " का युक्तिपूर्वक प्रयोग करनेसे उदररोग शान्त यावतोऽस्य पिबेद्विन्दूस्तावद्वारान्विरिच्यते ॥६॥होते हैं ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ कुष्ठं गुल्ममुदावते श्वयधुं सभगन्दरम् ।' इत्युदराधिकारः समाप्तः। शमयत्युदराण्यष्टौ वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा । एतद्विन्दुघृतं नाम येनाभ्यक्तो विरिच्यते ।। ६४ ॥ अथ प्लीहाधिकारः। आकका दूध ८ तोला, थूहरका दूध २४ तोला, हर्र, कवीला, कालानिसोथ, अमलतासका गूदा, इन्द्रायण, नील, निसोथ, दन्ती, कालादाना, तथा चीतकी जड़ प्रत्येक १ यमान्यादिचूर्णम् । पल, घृत १ प्रस्थ (द्रवद्वैगुण्य कर १२८ तोला ) मिलाकर यमानिकाचित्रकयावशुकपकाना चाहिये । इसकी बिन्दुमात्रा मलिन कोष्ठवालोंको देनी षड्ग्रन्थिदन्तीमगधोद्भवानाम् । चाहिये । जितने बिन्दु इसके पिये जाते हैं, उतने ही दस्त प्लीहानमेतद्विनिहन्ति चूर्णआते हैं । यह कुष्ठ, गुल्म, उदावर्त, सूजन, भगन्दर, तथा उदररोगोंको इस प्रकार नष्ट करता है जैसे वृक्षको इन्द्रवज्र । मुष्णाम्बुना मस्तुसुरासवैर्वा ॥१॥ इस" बिन्दुघृत" की नाभिमें मालिश करनेसे भी दस्त आते | अजवायन, चीतकी, जड़, जवाखार, बच, दन्ती, है ॥६१-६४ ॥ तथा छोटी पीपलके चूर्णको गरम जल, दहीके तोड़, शराब अथवा आसवके साथ सेवन करनेसे प्लीहा नष्ट होती स्नुहीक्षीरघृतद्वयम् । दधिमंडाढके सिद्धात्स्नुक्क्षीरपरिकल्कितात् । विविधा योगाः। घृतप्रस्थापिबेन्मात्रां तद्वज्जठरशान्तये ॥ ६५ ॥ पिप्पली किंशुकक्षारभावितां संप्रयोजयेत् । तथा सिद्धं घृतप्रस्थं पयस्यष्टगुणे पिबेत् । गुल्मप्लीहापहां वह्निदीपनी च रसायनीम् ॥२॥ स्नुक्क्षीरपलकल्केन त्रिवृता षट्पलेन च ॥ ६६॥ विडङ्गाज्याग्निसिन्धूत्थशक्तन्दग्ध्वा वचान्वितान् । (१) दहीका तोड़ ३ सेर १६ तोला, थूहरका दूध ४ तोला, पिबेत्क्षीरेण संचूर्ण्य गुल्मप्लीहोदरापहान् ॥ ३॥ गायका घी ६४ तोला मिलाकर सिद्ध किया हुआ घृत उदर तालपुष्पभवः क्षारः सगुड: प्लीहनाशनः। शान्ति के लिये पीना चाहिये । इसी प्रकार (२) घी १ प्रस्थ, क्षारं वा बिडकृष्णाभ्यां पूतीकस्याम्लनिःस्रुतम्॥४
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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