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________________ (१७) चक्रदत्तः। [प्रमेहा- - - - - -- - चत्वार एते मधुना कषायाः पाठाशिरीषदुस्पर्शमूर्वाकिंशुकतिन्दुकम् । कफप्रमेहेषु निषेवणीयाः॥७॥ कपित्थानां भिषक् काथं हस्तिमेहे प्रयोजयेत् ।।१४ (१)पठानी लोध, बडी हर्रका छिल्का, कायफल नागर | गुर्च और चीतकी जड़के काढ़ेके साथ मोथका क्वाथ (२) अथवा वायविडंग, पाढ, अर्जुन और | | छाल, भुनी हींग, कुटकी और कूठके चूर्णका सेवन करनेसे धामिनका क्वाथ (३) अथवा कदम्ब, शाल अर्जुन और | सर्पिर्मेह नष्ट होता है । तथा दुर्गन्धित खैर, खैर और सुपारीका अजवाइनका क्वाथ (४)अथवा वायविडंग, दारुहल्दी, धव क्वाथ मधुमेहमें पीना चाहिये । तथा अरणीका क्वाथ और शल्लकी (शालभेदः) का क्वाथ इनमेंसे किसी एकमे शहद | ५वसामेहमें पीना चाहिये । तथा पाढ़ सिआकी छाल, थवासा, मिलाकर कफप्रमेहवालोंको पाना चाहिये॥६॥७॥ मूर्वा, ढाकके फूल और तेन्दू तथा कैथेका क्वाथ हस्तिमेहमें षण्मेहनाशकाः षट क्वाथाः।। देना चाहिये ॥ १२-१४॥ अश्वत्थाश्चतुरंगुल्या न्यग्रोधादेः फलत्रिकात् । कफपित्तमेहचिकित्सा। सजिङ्गिरक्तसाराच काथाः पञ्च समाक्षिकाः ।।८।। कम्पिल्लसप्तच्छदशालजानि नीलहारिद्रफेनाख्यक्षारमजिष्ठकाहयान् । __ विभीतरोहीतककोटजानि । मेहान्हन्युः क्रमादेते सक्षौद्रो रक्तमेहनुत् । कपित्थपुष्पाणि च चूर्णितानि काथः खजूरकाश्मयतिन्दुकास्थ्यमृताकृतः ॥९॥ क्षौद्रेण लिह्यात्कफपित्तमेही ॥ १५ ॥ (१)पीपलकी छालका काथ, (२) अमलतासके गूदेका कवीला, सप्तपर्ण, शाल, बहेड़ा, रुहेडा, कुटज और कैथके क्वाथ (३) न्यग्रोधादि गणका क्वाथ, (४ ) त्रिफलाका | फूलका चूर्ण कर शहदके साथ कफपित्तज प्रमेहमें चाटना काथ, (५) मीठ व लालचन्दनका क्वाथ यह पांच क्वाथ चाहिये ॥ १५॥ शहदके साथ क्रमशः नील, हारिद्र, फेन, क्षार और मअिष्टमेहको नष्ट करते है। तथा (६) छुहारा, खम्भार, तेन्दूकी त्रिदोषजमेहचिकित्सा। गुठली और गुर्चका क्वाथ शहदके साथ रक्त प्रमेहको नष्ट सर्वमहहरों धात्र्या रसः क्षीद्रनिशायुतः । करता है ॥ ८-९॥ कषायत्रिफलादारुमुस्तकैरथवा कृतः ॥ १६ ॥ कषायचतुष्टयी। फलत्रिकं दारुनिशा विशाला लोध्रार्जुनोशीरकुचन्दनाना मुस्तं च निःक्वाथ्य निशांशकल्कम् । मरिष्टसेव्यामलकाभयानाम् । पिबेत्कषायं मधुसंप्रयुक्त धाव्यर्जुनारिष्टकवत्सकानां सर्वेषु मेहेषु समुत्थितेषु ॥ १७ ॥ नीलोत्पलैलातिनिशार्जुनानाम् ॥ १०॥ आंवलेका रस, शहद और हल्दीके चूर्णके साथ समस्त चत्वार एते विहिताः कषायाः प्रमेहोंके नष्ट करता है। अथवा त्रिफला, देवदारु और नागरमोथाका क्वाथ पीना चाहिये । अथवा त्रिफला, दारुहल्दी, इन्द्रायणकी पित्तप्रमेहे मधुसंप्रयुक्ताः॥ ११ ॥ जड़ तथा नागरमोथाका क्वाथ हल्दीका कल्क और शहद मिलाकर (१) लोध, अर्जुन, खश, लालचन्दन (२) नीमकी छाल, समस्त प्रमेहोंमें सेवन करना चाहिये ॥ १६ ॥१७॥ खश, आंवला, बडी हरे (३) आंवला, अर्जुनकी छाल,नीमकी छाल, कुरैषाकी छाल (४) अथवा नीलोफर, इलायची, तिनिश विविधाः क्वाथाः। और अर्जुनकी छाल इस प्रकार लिखे चार क्वाथों से कोई कटंकटेरीमधुकत्रिफलाचित्रकैः समैः । भी शहद मिलाकर सेवन करनेसे पित्तप्रमेह नष्ट होता सिद्धः कषायः पातव्यः प्रमेहाणां विनाशनः॥१८॥ है॥१०॥११॥ त्रिफलादारुदाय॑ब्दक्काथः क्षौद्रेण मेहहा । वातजमेहचिकित्सा। कुटजाशनदाय॑ब्दफलत्रयभवोऽथवा ॥ १९॥ दारुहल्दी, मौरेठी, त्रिफला तथा चीतकी जड़का काथ छिन्नावह्निकषायण पाठाकुटजरामठम् । .. समस्त प्रमेहोंको नष्ट करता है । तथा त्रिफला, देवदारु, दारुहल्दी तिक्तां कुष्ठं च संचूर्ण्य सर्पिमेहे पिबेन्नरः ॥ १२ ॥ व नागरमोथाका क्वाथ शहदके साथ पीनसे प्रमेहको नष्ट करता है। कदरखदिरपूगकाथं क्षौद्राह्वये पिबेत् । इसी प्रकार कुटज, विजैसार, दारुहल्दी, नागरमोथा और त्रिफभनिमन्थकषायं तु वसामेहे प्रयोजयेत् ॥ १३॥ लाका काथ समस्त प्रमेहोको नष्ट करता है ॥ १८॥ १९ ॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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