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________________ (१५६ ) चक्रदत्तः । हाऊबेर, त्रिकटु, बड़ी इलायची, चव्य, चीतकी, जड़, पर उतारना चाहिये । यह घृत पित्तगुल्म, रक्तगुल्म, विसर्प, सेंधानमक, सफेद जीरा, पिपरामूल, अजवायन इनका कल्क पित्तज्वर, हृद्रोग, कामला तथा कुष्ठको नष्ट करता है । और कल्कसे चतुर्गुण घृत तथा घृतके समान प्रत्येक बेर व इस क्वाथमें पलके मानसे द्विगुण नहीं होता, अतएव मूली का रस (काथ) दूध, दही व अनारका रस छोड़कर पकाना ४० पल अर्थात् १६० तोला ( २ सेर ) जल छोड़ा चाहिये । यह वातगुल्म, शूल, आनाह तथा विबन्ध, योनिदोष, जाता है ॥ ६४-६८ ॥ अर्श, ग्रहणीदोष, श्वास, कास, अरुचि ज्वर, पसलियों, हृदय और बस्तिके शुलको नष्ट करता है ॥ ५८-६० ॥ द्राक्षाद्यं वृतम् । द्राक्षामधूकखर्जूरं विदारी सशतावरीम् । परूषकाणि त्रिफलां साधयेत्पलसंमिताम् ॥ ६९ ॥ जलाढके पादशेषे रसमामलकस्य च । घृतमिक्षुरसं क्षीरमभयाकल्कपादिकम् ॥ ७० ॥ साधयेत्तु घृतं सिद्धं शर्कराक्षीद्रपादिकम् । याजयेत्पित्तगुल्मन्नं सर्वपित्तविकारनुत् ॥ ७१ ॥ साहचर्यादिह पृथग्घृतादेः क्वाथतुल्यता ॥ ७२ ॥ पञ्चपलकं घृतम् । पिप्पल्याः पिचुरध्यर्धो दाडिमाद् द्विपलं पलम् । धान्यात्पश्व घृताच्छुण्ठयाः कर्षः क्षीरं चतुर्गुणम् ॥ सिद्धमेतैर्धृतं सद्यो वातगुल्मं चिकित्सति । योनिशूलं शिरःशूलमशसि विषमज्वरान् ॥ ६२ ॥ छोटी पीपल १॥ तोला, अनारदानेका रस ८ तोला, धनियां ४ तोला, घी २० तोला, सोंठ १ तोला, दूध १ सेर छोड़कर पकाना चाहिये । यह घी वातगुल्म, योनिशूल, शिरःशूल अर्श और विषमज्वरको नष्ट करता है ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ त्र्यूषणाद्यं घृतम् । त्र्यूषणत्रिफलाधान्यविडङ्गचव्यचित्रकैः । ॥ कल्कीकृतेर्धृतं सिद्धं सक्षीरं वातगुल्मनुत् ॥ ६३ त्रिकटु, त्रिफला, धनियां वायविडङ्ग, चव्य, चीतकी जड इनका कल्क तथा दूध मिलाकर सिद्ध किया गया घृत वातगुल्मको नष्ट करता है ॥ ६३ ॥ [ गुल्मा मुनक्का, महुवा, छुहारा, विदारीकन्द, शतावरी, फाल्सा तथा त्रिफला प्रत्येक ४ तोला लेकर एक आढ़क जलमें पकाना चाहिये, चतुर्थांश शेष रहनेपर उतार छानकर क्वाथके बराबर आंवले का रस, उतना ही ईखका रस, उतना ही घी, उतना ही दूध और घृतसे चतुर्थांश हर्रका कल्क छोड़कर पकाना | चाहिये । सिद्ध हो जानेपर उतार छानकर घीसे चतुर्थांश मिलित शहद व शक्कर छोड़ना चाहिये। यह पितगुल्म तथा समस्त पित्तरोगों को नष्ट करता है । यहां अनुक्तमान होनेसे साहचर्यात् घृतादिकाथ के समान ही छोड़ना चाहिये ॥ ६९-७२ ॥ धात्रीषट्पलकं घृतम् । धात्रीफलानां स्वरसे षडङ्गं पाचयेद् घृतम् । शर्करासैन्धवोपेतं तद्धितं सर्वगुल्मिनाम् ॥ ७३ ॥ त्रायमाणाद्यं घृतम् । जले दशगुणे साध्यं त्रायमाणाचतुष्पलम् । पञ्चभागस्थितं पूतं कल्कैः संयोज्य कार्षिकैः ॥ ६४ ॥ रोहिणीकटुका मुस्तत्रायमाणादुरालभैः । कल्कैस्तामलकीवीराजीवन्ती चन्दनोत्पलैः ॥ ६५ ॥ चाता है ॥ ७३ ॥ रसस्यामलकीनां च क्षीरस्य च घृतस्य च । पलानि पृथगष्टाष्टौ दत्त्वा सम्यग्विपाचयेत् ॥६६॥ पित्तगुल्मं रक्तगुल्मं विसर्प पैत्तिकं ज्वरम् । हृद्रोगं कामलां कुष्ठं हन्यादेतद् घृतोत्तमम् ||६७ ॥ पलोल्लेखागते माने न द्वैगुण्यमिष्यते । चत्वारिंशत्पलं तेन तोयं दशगुणं भवेत् ॥ ६८ ॥ त्रायमाण १६ तोला, जल २ सेर मिलाकर पकाना चाहिये । १ सेर बाकी रहनेपर उतार छानकर नीचे लिखी चीजोंका कल्क प्रत्येक एक तोला छोड़ना चाहिये । कल्कद्रव्य- कुटकी, मोथा, श्रायमाण, जवासा, भुंइआंवला, क्षीरकाकोली, जीवन्ती, चन्दन तथा नीलोफर और आंवलेका रस ३२ तोला, दूध ३२ तोला श्री ३२ तोला, मिलाकर पकाना चाहिये, घृतमात्र शेष रहने आंवलेकं स्वरसमें पञ्चकोल व यवाखारका कल्क व घी मिलाकर सिद्ध करनेसे समस्त गुल्मोंको लाभ पहुं भाङ्गषट्पलकं घृतम् । षड्भिः पलैर्मगधजाफलमूलचन्यविश्वौषधज्वलनयावजकल्कपक्कम् । प्रस्थं घृतस्य दशमूल्युरुबूकभाङ्गक्वाथेऽप्यथोपयसि दनि च षट्पलाख्यम् ॥७४॥ गुल्मोदरा रुचि भगन्दरवह्रिसादकासज्वरक्षयशिरोप्रहणीविकारान् । सद्यः शमं नयति ये च कफानिलोत्था भाङ्गर्याख्यषट्पलमिदं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥ ७५ ॥ पञ्चकोल व यवाखार प्रत्येक एक पल ( इस प्रकार ६ पल ) का कल्क, घी १ प्रस्थ ( १२८ तोला ) और दशमूल, एरण्ड
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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