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________________ (११८) चक्रदत्तः। [वातव्याध्यसन्न्न्न्न्न्न्न्न्न् खजता, पाङ्गुल्य, हनुग्रह, मन्याग्रह, वातिक अधिमन्थ, काजी ६४ तोला, दहीका तोड़ ६४ तोला, सौवीरक तुषो. शुक्रक्षय, कर्णनाद, कर्णशूल तथा कलायखञ्जको शान्त करता है । | दक, बेर, अनार तथा बिजौरे निम्बूका रस प्रत्येक द्रव ६४ ऊपर जो " षोड़शभिर्गुणैः" है उसका अर्थ यह है कि तैलसे तोला, तैल, घी, ची, मज्जा तथा दूध प्रत्येक ६४ तोला तथा १६ गुण जल छोड़कर क्वाथ बनाना चाहिये ॥ १६५-१७३॥जीवनीयगणकी ओषधियां मिलित २४ तोलाका कल्क छोड़कर पकाना चाहिये । यह महास्नेह मालिशके लिये शिरा, मज्जा तथा मन्जस्नेहः। | अस्थिगत वात, सर्वाङ्गरोग, एकाङ्गरोग, कम्प, आक्षेप तथा प्राम्यानूपौदकानां तु भिन्नास्थीनि पचेजले । शूलमें प्रयुक्त करना चाहिये ॥ १७८-१८२ ॥ तं स्नेहं दशमूलस्य कषायेण पुनः पचेत् ॥ १७४॥ कुब्जप्रसारणीतैलम् । जीवकर्षभकास्फोताविदारीकपिकच्छुभिः । प्रसारणीशतं क्षुण्णं पचेत्तोयामणे शुभे । वातन्नेर्जीवनीयैश्च कल्कैक्षिीरभागिकम् ॥१७॥ पादशिष्टे समं तैलं दधि दद्यात्सकाजिकम् ॥ १८३ तत्सिद्धं नावनाभ्यगात्तथा पानानुवासनात् । द्विगुणं च पयो दत्त्वा कल्कान्द्विपलिकांस्तथा । शिरः पार्थास्थिकोष्ठस्थं प्रणुदत्याशु मारुतम्१७६॥| चित्रकं पिप्पलीमूलं मधुकं सैन्धवं वचाम् ॥१८४॥ ये स्युः प्रक्षीणमजानः क्षीणशुक्रोजसश्च ये।। शतपुष्पां देवदारु रानां वारणपिप्पलीम् । बलपुष्टिकरं तेषामेतत्स्यादमृतोपमम् ॥ १७७ ॥ प्रसारण्याश्च मूलानि मांसीं भल्लातकानि च॥१८५।। ग्राम्य, आनूप तथा औदक प्राणियोंकी हड्डियोंको चूर्ण कर | पचेन्मृद्वग्निना तैलं वातश्लेष्मामयाञ्जयेत् । जलमें पकाना चाहिये, जितना इसका स्नेह निकले उससे चतुगुण अशीतिं नरनारीस्थान्वातरोगानपोहति ॥ १८६॥ दशमूलक्वाथ तथा द्विगुण दूध तथा जीवक, ऋषभक, आस्फोता | कुब्जं स्तिमितपंगुत्वं गृध्रसीं खुडकार्दितम् । (विष्णुकान्ता या हापरमाली ) विदारीकन्द, कौंचके बीज, हनुपृष्ठशिरोग्रीवास्तम्भ वापि नियच्छति ॥ १८७।। वातघ्न ( देवदादि ) तथा जीवनीयगणकी ओषधियोंका कल्क स्नेहसे चतुर्थांश छोड़कर पकाना चाहिये । यह स्नेह नस्य, अनु- गन्धप्रसारणी ५ सेर जल १द्रोणमें पकाना चाहिये । चतुबासन, बस्ति, मालिश तथा पीनेसे शिर, पसली, हड्डी तथा र्थोशं शेष रहनेपर उतार छान क्वाथके समान तैल तथा उतना कोष्ठगत वायुको नष्ट करता है, जिनके मज्जा, ओज तथा शुक्र ही दही और उतना ही काजी और तैलसे दूना दूध तथा क्षीण हो गये हैं, उनके लिये यह स्नेह अमृततुल्य बल तथा पुष्टि चीतकी जड़, पिपरामूल, मौरेठी, सेंधानमक, वच, सौंफ, देवकरनेवाला है ॥ १७४-१७७ ॥ दारु, रासन, गजपीपल, गन्धप्रसारणीकी जड़, जटामांसी, भिलावां प्रत्येक ८ तोलाका कल्क छोड़कर मन्दाग्निसे पकाना महास्नेहः। चाहिये । यह तेल वातकफके रोगोंको जीतता तथा अस्सी प्रकारके पुरुष तथा स्त्रियोंके वातरोगों तथा कुब्जता, जकड़ाहट, 'प्रस्थास्यात्रिफलायास्तु कुलत्थकुडवद्वयम् । कृष्णगन्धात्वगाढक्योः पृथक्पञ्चपलं भवेत्। |पंगुता, गृध्रसी, वातकंटक, हनु, पृष्ठ, शिर व गर्दनकी जकड़ाहट इत्यादिको नष्ट करता है ॥ १८३-१८७ ॥ रास्नाचित्रकयोद्धे द्व दशमूलं पलोन्मितम् । जलद्रोणे पचेत्पादशेष प्रस्थोन्मितं पृथक् ॥ १७९॥ त्रिशतीप्रसारणीतैलम् । सुरारनालध्यम्लसौवीरकतुषोदकम् । प्रसारण्यास्तुलामश्वगन्धाया दशमूलतः । कोलदाडिमवृक्षाम्लरसं तैलं घृतं वसाम् ॥१८०॥ तुला तुलां पृयग्वारि द्रोणे पादांशशेषिते ॥१८८ ॥ मज्जानं च पयश्चैव जीवनीयपलानि षट् । कल्कं दत्त्वा महास्नेहं सम्यगेनं विपाचयेत् ॥१८१] १ सौवीर तथा तुषोदककी निर्माणावीध-“ सौवीरस्तु यवै. शिरामज्जास्थिगे वाते सर्वाङ्गैकाङ्गरोगिषु । रामः पक्कैर्वा निस्तुः कृतः । गोधूमैरपि सौवीरमाचार्थाः केचिदूवेपनाक्षेपशुलेषु तमभ्यङ्गे प्रदापयेत् ॥ १८२॥ | चिरे" अर्थात् कच्चे या पक भूसीरहित यवोंको अष्टगुण जल पूरित घड़ेमें बन्द कर १५ दिनतक रख छानकर काममें लाना त्रिफला ६४ तोला, कुलथी ३२ तोला, सहिंजनेकी छाल चाहिये । कुछ लोग गेहुओंसे भी सौवीरक बनाना कहते हैं। २० तोला, अरहर २० तोला, रासन ८ तोला, चीतकी जड ८" तुषाम्बु संधित ज्ञेयमामैर्विदलितर्यवैः । तुषोदकं तुषजलं तोला, दशमूल प्रत्येक द्रव्य ४ तोला, जल १२ सेर ६४ तोला तदेव परिकीर्तितम् ॥” अथवा-"भृष्टान्माषतुषान्सिद्धान्यवांस्तु छोड़कर पकाना चाहिये, चतुर्थांश शष रहनेपर उतार छान- चूर्णसंयुतान् । आभूतानम्भसा तद्वज्जातं तच तुषोदकम् । तुषोक्वाथ अलग रखना चाहिये । उसी काथमें शराब ६४ तोला, दकं यवैरामैः सतुषैः शकली कृतैः॥"
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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