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________________ धिकारः] भाषाटीकोपेतः। . (११७) ६४ तोला, तैल, ६४ तोला, दूध ३ सेर १६ तोला तथा को ही क्या समस्त वातरोगोंको नष्ट करता है * ॥ रासन, कौंचके बीज, सेंधानमक सौंफ, एरण्डकी छाल, ॥१५७-१६४ ॥ नागरमोथा, जीवनीयगणकी औषधियां खरेटी, तथा त्रिकटु प्रत्येक १ तोलाका कल्क छोड़कर पकाना चाहिये । यह षष्ठं महामाषतैलम् । तैल बस्ति, अभ्यङ्ग, नस्य तथा पानसे हस्त व शिरके कम्प, द्विपञ्जमूली निष्काध्य तैलाषोडशभिर्गुणैः । बाहुशोष, अवबाहुक, बाधिर्य कर्णशूल, कर्णनाद, विश्वांची, अर्दित, कुब्ज, गृध्रसी, अपतानक तथा शिरके रोगोंको नष्ट माषाढकं साधयित्वा तन्नि!हं चतुर्गुणम् ॥१६५।। करता है। द्रव द्रव्य अर्थात् क्वाथ तैल द्विगुण मात्रामें छोड़ना ग्राहयित्वा तु विपचेत्तैलप्रस्थं पयः समम् । चाहिये ॥१५२-१५६ ॥ कल्काथै च समावाप्य भिषग्द्रव्याणि बुद्धिमान् १६६ अश्वगन्धां शटी दारु बलां रानां प्रसारणीम् । पञ्चमं माषतैलम् । कुष्ठं परूषकं भाी द्वे विदायौं पुनर्नवाम् ।।१६७।। माषस्यार्धाढकं दत्त्वा तुलाध दशमूलतः ॥ १५७ ॥ मातुलुङ्गफलाजाज्यौ राम; शतपुष्पिकाम् । पलानि छागमांसस्य त्रिंशद् द्रोणेऽम्भसः पचेत् । शतावरी गोक्षुरकं पिप्पलीमूलचित्रकम् ।। १६८॥ पूतशीते कषाये च चतुर्थाशावतारिते ॥ १५८ ॥ जीवनीयगणं सर्व संहृत्यैव ससैन्धवम् । तत्साधु सिद्धं विज्ञाय माषतैलमिदं महत् ॥१६९॥ प्रस्थं च तिलतैलस्य पयो दद्याश्चतुर्गुणम्। बस्त्यभ्यजने पाननावनेषु प्रयोजयेत् ।। आत्मगुप्तोरुबूकश्च शताला लवणत्रयम् ॥ १५९।। पक्षाघाते हनुस्तम्भे अर्दिते सापतन्त्रके ।। १७० ।। जीवनीयानि मजिष्ठा चव्यचित्रककट्फलम् । अबबाहुकविश्वाच्योः खजपॉलयोरपि । . सव्योष पिप्पलीमूलं रास्त्रामधुकसैन्धवम् ॥१६०॥ हनुमन्याग्रहे चैवमधिमन्थे च वातिके ॥ १७१ ॥ देवदार्वमृता कुष्ठं वाजिगन्धा वचा शटी। शुक्रक्षये कर्णनादे कर्णशुले च दारुणे । एतैरक्षसमैः कल्कैः साधयेन्मृदुनाग्निना ।। १६१ ॥ कलायखजशमने भैषज्यामिदमादिशेत्॥ १७२ ॥ दशमूलाढकं द्रोणे निष्काथ्य पादिको भवेत् । पक्षाघातार्दिते वाते बाधिर्ये हनुसंग्रहे । काथश्चतुर्गुणस्तैलान्माषकाथेऽप्ययं विधिः ॥१७३॥ कर्णनादे शिरःशूले तिमिरे च त्रिदोषजे ॥ १६२॥ दशमूल .३ सेर १६ तो०, जल २५ ‘सेर ४८ तोले में पाणिपादशिरोप्रीवाभ्रमणे मन्दचक्रमे । पकाकर क्वाथ ६ सेर ३२ तो०, उड़द ४ प्रस्थका क्वाथ ६ सेर कलायखजे पाङ्गुल्ये गृध्रस्यामवबाहुके ॥१६३ ॥ ३२ तोला, तैल १२८ तोला, दूध .१२८ तोला, असगन्ध, पाने बस्ती तथाभ्यङ्गे नस्ये कर्णाक्षिपूरणे। कचूर, देवदारु, खरेटी, रासन, गन्धप्रसारणी, कूठ, फाल्सा, तेलमेतत्प्रशंसन्ति सवेवातरुजापहम् ।। १६४।। भाी, विदारीकन्द, क्षीरविदारी, पुनर्नवा, बिजौरे निम्बूका फल, सफेद जीरा. भनी हींग, सौंफ, शतावरी, गोखुरू, पिपरामूल, उड़द १॥ सेर ८ तोला, दशमूल २॥ सेर, बकरेका मांस | चीतकी जड़, जीवनीयगण, सेंधानमक सब समानभाग का कल्क १॥ सेर, सब २५ सेर ४८ तोला जलमें पकाना चाहिये । छोड़कर तेल पकाना चाहिये। यह “महामाषतैल "-बस्ति, चतुर्थांश शेष रहने पर उतार छान १ प्रस्थ तिल तैल, दूध मालिश, पान तथा नत्यके लिये प्रयुक्त करना चाहिये। यह ६ सेर ३२ तोला, कौंचके बीज, एरण्डकी छाल, सौंफ, तीनों पक्षाघात, हनुस्तम्भ, अर्दित, अपतन्त्रक, अवबाहुक, विश्वाची, नमक, जीवनीयगणकी औषधियां, मजीठ, चव्य, चीतकी जड़, कैफरा, त्रिकटु, पिपरामूल, रासन, मौरेठी, सेंधानमक, * इसी तैलके अनन्तर त्रिशतीप्रसारिणी तैल दूसरी देवदारु, गुर्च, कूठ, अश्वगन्ध, बच. कचूर, प्रत्येक १ तोलाका प्रतियोंमें लिखा है, पर माष तैलोंके मध्यमें प्रसारिणीतैल • कल्क छोड़कर मन्द आंचपर पकाना चाहिये । इस तलको लिखना उचित नहीं समझा गया, किन्तु आगे त्रिशतीपिलाने, बस्ति देने, मालिश नस्य, कान तथा नेत्रों में डाल- | प्रसारिणी तैल दूसरा लिखेंगे। उसमें और इसमें पाठभेदके नेके लिये प्रयोग करना चाहिये। यह पक्षाघात, अर्दित, सिवाय कोई दूसरा अन्तर नहीं है। हां, इसमें गुण अधिक - बाधिर्य, ठोढ़ीकी जकड़ाहट, कर्णनाद, शिरःशूल, तिमिर, लिख दिये गये हैं उतने उसमें नहीं लिखे । पर तैल एक हाथ, पैर, शिर, गर्दनके घूमने तथा पैरोंकी शक्ति कम ही होनेसे गुणोंमें अन्तर नहीं हो सकता, अतः वहींपर इसका , हो जाने, कलायखज, पांगुल्य, गृध्रसी, और अवबाहुक-भी पाठ देखिये ॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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