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________________ (१८) [ मच्छी - चिरोत्थतृष्णाचिकित्सा। मद्यजायां वमेन्मद्यं निन्द्रां सेवेद्यथासुखम् । ओदन रक्तशालीनां शीतं माक्षिकसंयुतम् । । विषजायां विषनानि भेषजानि प्रयोजयेत् ॥ ४॥ भोजयेत्तेन शाम्येत्त छर्दिस्तृष्णा चिरोत्थिता ॥२२ दोषज मूमें यथादोष ज्वरनाशक काढ़े तथा रक्तजन्य लाल चावलोंका भात ठण्डा कर शहद मिलाकर भोजन | मू में शीत क्रियाएँ हितकर हैं । मद्यजन्य मूछामें मद्यका वमन करनेसे चिरोत्थ तृष्णा शान्त होती है ॥ २२ ॥ कर सुखपूर्वक सोना चाहिये । विषजन्य मूर्छा में विषनाशक , औषधियोंका प्रयोग करना चाहिये ॥ ३ ॥४॥ जलदानावश्यकता। पूर्वामयातुरः सन्दीनस्तृष्णार्दितो जलं याचन् । कोलादिचूर्णम् । न लभेत चेदाश्वेव मरणमाप्नोति दीर्घरोग वा॥२३/ कोलमज्जोषणोशीरकेशरं शीतवारिणा । तृषितो मोहमायाति मोहात्प्राणान्विमुञ्चति । । पीतं मूच्छी जयेल्लीढं तृष्णां वा मधुसंयुतम् ॥५॥ तस्मात्सर्वास्ववस्थामु न कचिद्वारि वार्यते ॥२४॥ बेरकी गुठली, काली मिर्च, खश तथा नागकेशरका चूर्ण ठंढे जलके साथ पीनेसे अथवा शहद मिलाकर चाटनेसे छर्दि पहिले किसी रोगसे पीड़ित हुआ और उसी में तृष्णा बढ़| व तृष्णा शान्त होती है ॥५॥ गयी और जल मांगता, है, ऐसी अवस्थामें जल न मिलनेसे | शीघ्रही मर जाता है । अथवा कोई बड़ा रोग हो जाता है । महौषधादिक्वाथः। प्यास अधिक लगने पर मूर्छा होती है । मूर्छासे प्राणत्याग कर महीषधामृताक्षुद्रापौष्करग्रन्थिकोद्भवम् । देता है।अतः किसी अवस्थामें जलका निषेध नहीं है ॥२३॥२४॥ पिवेत्कणायुतं काथं मूछायेषु मदेषु च ॥६॥ इति तृष्णाधिकारः समाप्तः॥ सोंठ, गुर्च, छोटी करेंटी, पोहकरमूल तथा पिपरामूलका क्वाथ पिप्पलीका चूर्ण मिलाकर पीनसे मूर्छा व मद शान्त चूर्ण मिलाकर पानाल तथा पिपराम अथ मूर्छाधिकारः। / होता है भ्रमचिकित्सा। शतावरीबलामूलद्राक्षासिद्धं पयः पिबेत् । सामान्यचिकित्सा। ससितं भ्रमनाशाय बीजं वाट्यालकस्य वा॥७॥ सेकावगाही मणयः सहाराः पिबेद् दुरालभाकाथं सघृतं भ्रमशान्तये। शीताः प्रदेहा व्यजनानिलश्च । त्रिफलायाः प्रयोगो वा प्रयोगः पयसोऽपि वा । शीतानि पानानि च गन्धवन्ति रसायनानां कौम्भस्य सर्पिषो वा प्रशस्यते ॥ ८॥ स्वनिवारितानि ॥१॥ शतावरी, खरेटीकी जड़ तथा मुनक्कासे सिद्ध दूध मिश्रीके सिद्धानि वर्गे मधुरे पयांसि साथ पीनेसे चक्कर आना बन्द होता है । इसी प्रकार खरेटीके बीजोंका चूर्ण मिश्री दूधके साथ भ्रमको नष्ट करता है । अथवा सदाडिमा जाङ्गलजा रसाश्च । यवासाका काथ घी मिलाकर अथवा त्रिफलाका प्रयोग अथवा तथा यवा लोहितशालयश्च द्धका प्रयोग अथवा रसायन औषधियोंका प्रयोग अथवा मूर्छासु शस्ताश्च सतीनमुद्राः ॥२॥ "कौम्भ" संज्ञक (१० वर्ष या १०० वर्ष पुराने ) घृतका प्रयोग शीतल दवदव्यांसे सिञ्चन तथा अवगाह ( जलादिमें | हितकर है ॥७॥८॥ बैठना ) शीतल मणि तथा हार तथा शीतल लेप व पंखे त्रिफलाप्रयोगः। की वायु तथा गन्धयुक्त शीतल पानक समस्त मूर्छाओंमें | हितकर हैं । तथा मधुरवर्गमें सिद्ध दूध तथा जांगल प्राणि- मधुना हन्त्युपयुक्ता त्रिफला रात्री गुडाकं प्रातः। योंका मांसरस तथा लाल चावल, यव व मटर, मूगका पथ्य सप्ताहात्पथ्यभुजो मदमूछोकासकामलोन्मादान्९ हितकर है॥१॥२॥ शहदके साथ त्रिफला रातमें तथा गुड़ अदरख प्रात: काल सेवन करनेसे पथ्य भोजन करनेवालेके सात दिनमै यथादोषं चिकित्साक्रमः। यथादोषं कषायाणि ज्वरनानि प्रयोजयेत् । १ स्थितं वर्शतं श्रेष्ठं काम्भं सर्पिस्तदुव्यते । " इति रक्तजायां तु मूर्छायां हितः शीतक्रियाविधिः।।शा तत्त्वमन्द्रिका ।
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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