SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 580
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ [6] एक पुद्गल को देखना 487 अब जो रूपी परमाणु, रूपी हैं, उनका मुख्य गुण कौन सा है? तो वह है, पूरण-गलन का स्वभाव। जो पूरण हुआ है, गलन होता रहता है, गलन हो गया हो तो वापस पूरण होता रहता है। अतः पूरण-गलन, पूरणगलन, पूरण-गलन होता ही रहता है। यहाँ से खाना डाला और पानी पीया तो फिर संडास में, बाथरूम में। यहाँ से श्वास लिया तो उच्छ्वास। यों पूरण-गलन, पूरण-गलन होता ही रहता है। नहीं होता? प्रश्नकर्ता : होता है न! दादाश्री : यह सब उसका गुण है। महावीर क्या तप करते थे, वह समझ गए न आप?! अदीठ तप! महावीर सिर्फ एक ही पुद्गल को किस तरह से देखते थे? अंदर की ही सब गतिविधियाँ, सभी क्रियाएँ, अंदर होनेवाले स्पंदन मात्र तक के जानकार रहते थे वे। बाकी बाहर का कुछ भी नहीं देखते थे, इसी का देखते थे। प्रश्नकर्ता : क्रोध-मान-माया-लोभ का यों पृथ्थकरण करना हो, तो विशेष परिणाम स्वरूप अहम् खड़ा हुआ, क्या उसके बाद ये व्यतिरेक गुण उत्पन्न होते हैं? फिर अगर क्रोध होता है, तो क्रोध और अहम् का क्या संबंध दादाश्री : वह सब पुद्गल है लेकिन पुद्गल में हाथ डालकर क्या करना है? शुद्धात्मा के अलावा सभी कुछ पुद्गल है, उसमें हाथ डालने से क्या मतलब है? तुझे पुद्गल में से कुछ निकालना है? उसका अर्क निकालना है? प्रश्नकर्ता : यह सारा संबंध क्या है? दादाश्री : समझने जैसा आत्मा है और बाकी का सारा पुद्गल। तो जो पुद्गल में है, उसका तुझे कुछ करना है क्या? तो फिर उसे विस्तार से समझें! उसमें से क्या तुझे कुछ पुद्गलसार बाहर निकालना है? सिर्फ आत्मा ही पूर्ण करना है या अंदर सार भी निकालना है पुद्गल का? प्रश्नकर्ता : आत्मा ही पूर्ण करना है।
SR No.030023
Book TitleAptavani Shreni 13 Purvarddh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDada Bhagwan
PublisherDada Bhagwan Aradhana Trust
Publication Year2015
Total Pages518
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy