________________ वसूली की परेशानी (22) 345 साफ कह दिया कि, 'भाई, अब तो मैंने व्यवहार हीराबा को सौंप दिया है। मैंने अपने हाथ में कुछ रखा ही नहीं।' ऐसा कह दिया था। इसलिए फिर झंझट ही मिट गया न! 'अब मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है, घर में मेरा कुछ चलता ही नहीं' ऐसा कह दिया था। ...तब भी रुपये की चिंता किसी को रुपये उधार दिए हों, दो प्रतिशत ब्याज पर या डेढ़ प्रतिशत ब्याज पर या तीन प्रतिशत ब्याज पर, लेकिन यह सोचकर देना कि ये फिर कभी नहीं दिखेंगे। बाद में फिर वापस आ जाएँ तब उसे नफा समझना। एक बार रुपये दे देने के बाद उसकी चिंता उपाधि नहीं करनी चाहिए। क्योंकि आपके हाथ में यह सत्ता है ही नहीं। इन लोगों के हाथ में एक घड़ी जीने की भी सत्ता नहीं है। कौन-से सेकन्ड में मर जाएँगे उसका भी ठिकाना नहीं है और रुपयों की चिंता करते रहते हैं। अरे! क्या कभी रुपयों की चिंता करनी चाहिए? ___...उसमें अपनी ही भूल एक बनिये से ब्राह्मण चार सौ रुपये माँग रहा था, वह ज़ब्ती करने गया। तो वणिक तो चिढ़ गया, 'साले! नालायकों! ऐसे बोलता जाता था और वापस कहता कि, 'मेरे जैसा नालायक कोई है ही नहीं न!' अरे, तू खुद को गालियाँ दे रहा है? ब्राह्मण को इतनी सारी गालियाँ दी और फिर बोलता क्या है? 'मेरे जैसा नालायक कोई है ही नहीं।' रुपये नहीं दिए तभी यह दशा हुई न! ऐसा कहता जाता और वापस ब्राह्मण को भी नालायक कहता! अरे, ये किस तरह के इंसान हो? ये तो तरह-तरह की खोपड़ियाँ हैं। अब वह उस ब्राह्मण को नालायक कहता है, और वापस खुद अपने लिए भी ऐसा ही कहता है। तब फिर हमें हँसना ही आएगा न?