________________ 330 आप्तवाणी-७ सिस्टम रखा है। हमारी माँ जी ने सिखाया था, वे खुद भी जानबूझकर ठगी जाती थीं और सभी को संतुष्ट करती थीं। वह मुझे बहुत पसंद आया कि ये तो सभी को बहुत अच्छी तरह संतुष्ट करती हैं! और जान-बूझकर ठगे जाने से कौन सी संपत्ति थी जो चली जाएगी? संपत्ति में क्या कम हो जाएगा? प्रश्नकर्ता : अभी भी जान-बूझकर ठगे जाने की हिम्मत नहीं आती। दादाश्री : ठगे जाने की हिम्मत? अरे, मुझे तो थोड़ी भी देर नहीं लगती और मुझे कोई ठगने आए तो मैं समझ जाता हँ कि यह ठगने आया है इसलिए ठगे जाओ, फिर ऐसा ग्राहक नहीं मिलेगा। फिर ऐसा ग्राहक कहाँ से मिले? और देख तेरी तो हिम्मत ही नहीं होती न! प्रश्नकर्ता : इस व्यापार में क्या होता है कि हमें पता है कि इस माल का मार्केट प्राइज़ यह है। वह व्यक्ति एक टन पर हज़ार रुपये अधिक चार्ज कर रहा है, तो ऐसा समझ में आने पर भी एक हज़ार रुपये अधिक देने की हिम्मत नहीं होती। इसलिए फिर उससे कह देते हैं कि, 'नहीं, प्राइज़ तो इतनी ही होनी चाहिए।' उसके साथ पहले थोड़ी-बहुत बात करनी पड़ती है। दादाश्री : जान-बूझकर देना तो ऐसा है न, कि हम जो जान-बूझकर ठगे जाते हैं, वह तो अपवाद है और अपवाद कभी कभार ही होता है। वर्ना, लोग जान-बूझकर ठगे जाते हैं, वे तो शर्म के मारे नहीं तो दूसरे किसी अंदरूनी कारण से ठगे जाते हैं। वर्ना लोगों को जान-बूझकर ठगे जाने का ध्येय नहीं होता, जबकि हमारा तो ध्येय था कि जान-बूझकर ठगे जाना है। भोजन करके जाने दो हम खटमल को जान-बूझकर काटने देते थे, उसे वापस तो नहीं निकाल सकते न बेचारे को! अपने होटल में आया है तो