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________________ (५८) અને બીજા વ્યંજન સાથે જોડાઈને જોડાક્ષર નહીં થયો હોય, तो, तभनी पारीन सोथाय छ; अभड, क-लोओ (लोकः); सअटं (शकटं); मुउलः (मुकुलः); णउलो (नकुलः); णोआ (नौका); मुउलिदा (मुकुलिता); ग-णओ (नगः); णरं (नगरं); मअंको (मृगाङ्कः); साअरो (सागरः); भाईरही ( भागीरथी); भअवदा (भगवता); च-सई (शची); कअग्गहो (कचग्रहः); वअणं (वचन) ; सूई (सूची); रोअदि, (रोचते); उइदं ( उचितं); सूअरं (सूचकं); ज-रअओ (रजकः); पआवई (प्रजापतिः); गओ (गजः); रअदं ( रजतं)त-विआणं (वितानं); किअं ( कृतं); रसाअलं ( रसातलं); रअणं (रत्नं ) ; द-जइ ( यदि); नई (नदी); गआ (गदा); मअणो (मदनः); वअणं (वदनं); मओ (मदः); प-रिऊ (रिपुः); सुररिसो (सुपुरुषः); कई ( कपिः ); विउलं (विपुलं); यदलू ( दयालुः); णअणं ( नयनं); विओओ ( वियोगः); वाउणा ( वायुना); व-जीओ ( जीव:); दिअहो ( दिवसः) लाअण्णं (लावण्यं ); विओहो (विबोधः); वलआणलो ( वडवानलः)। प्रायो ग्रहणात् कचिन् न भवति । २॥ सूत्रमा “प्राय: पy रीन" मे ५४ भुस्यु छ, तेथी, मेम समभवातुंछ, मानिયમને કેટલાએક અપવાદ છે. એજ હેતુથી બાઝતાજામાં એવું
SR No.023387
Book TitleLaghu Ane Bruhat Prakrit Vyakaran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDalichand Pitambardas
PublisherDalichand Pitambardas
Publication Year1905
Total Pages574
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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