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________________ (३०६). खेड्डयं कयमम्हेहिं निच्छयं किं पयम्पह । अणुरत्ताउ भत्ताउ अम्हे मा चय सामि॥ रम्यस्थ रवण्णः । सरिहिं न सरेहिं न सरवरेहिं नवि उजाण-वहिं । देस रवण्णा होन्ति वढ निवसन्तेहिं सु-अणेहिं ॥ अद्भुतस्य ढक्करिः । हिजडा पई एहु बोलिओ महु अग्गइ सय वार ॥ फुट्टिसु पिए पवसन्ति हउं भण्डय ढक्करि-सार ॥ हेसखीत्यस्य होलिः । हेल्लि म झङ्खहि आलु ॥ पृथक्पृथगित्यस्य जुअंजुमः ॥ एक्क कुडुल्ली पञ्चहिं रुद्धी तहं पञ्चहंवि जुअंजुअ बुद्धी । बहिणुए तं घरु कहि किव नन्दउ जेत्थु कुडुम्बङ अन्पण-छन्द। मूढस्य नालिअ वढौ। . जो पुणु मणि जि खसफसिहअउ चिन्तइ देइ न दम्मु न रूअउ । रइ-वस-भमिरु करग्गुल्ला लिउ घरहिं जि कोन्तु गुणइ सो नालिउ ॥ दिवहिं विढत्तउं खाहि वढ ॥ नवस्य नवखः । नवखी कवि विसगण्ठि ॥ अवस्कन्दस्य दडवडः ।। चलेहिं चलन्तेहिं लोअजेहिं जे तई दिट्ठा बालि । .. तहिं मयरद्धय दडवडउ पडइ अपूरइ कालि ॥ यदेश्छुडुः छुडु अग्घइ ववसाउ ॥ संबन्धिनः केर-तणौ ।
SR No.023387
Book TitleLaghu Ane Bruhat Prakrit Vyakaran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDalichand Pitambardas
PublisherDalichand Pitambardas
Publication Year1905
Total Pages574
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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