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________________ ( २३३ ) ॥ २१६ ॥ छिदि भिदो दः ॥ अनयोरन्त्यस्य नकाराक्रान्तो दकारो भवति ॥ छिदू भने भिद् धातुना अन्त्य वर्णना न्दु थाय छे छिन्दइ । भिन्दइ ॥ ॥ २१७ ॥ युध-बुध-गृध· कुध-सिध-मुहां ज्झः ॥ एषामन्त्यस्य द्विरुक्तो शो भवति ॥ युधू, बुध, गृधू, सिधू भने मुह से धातुना अन्त्य वर्णुना मेवडे । ज्झ थाय छे. जुज्झइ | बुज्झइ | गिज्झइ । कुज्झइ । सिज्झइ । मुज्झइ ॥ ॥ ३१८ ॥ रुघो न्ध-म्भौ च ॥ रुधोन्त्यस्य न्धम्भ इत्येतौ चकारात् ज्झश्च भवति ॥ रुधू धातुना व्यन्त्य घनान्धू, म्भ, भने ज्झ थाय छे रुन्धड् । कम्भइ । रुज्झइ ॥ ॥ २१९ ॥ सद पतोर्डः ॥ अनयोरन्त्यस्य डो भवति ।। सद् भने पत् धातुना अन्त्य वनो हूं थाय छे. सडइ | पडद्द ॥ ॥ २२० ॥ कथ वर्धा ढः ॥ अनयोरन्त्यस्य ढो भवति ॥ क्वथ्, वृधू अथवा वर्ष् धातुना अन्त्य वर्णन। थाय छे. कढइ । वडइ पवयकलला ॥ परिभवुडु लायपणं ॥ बहुवचनाद् वृधेः कृतगुणस्य वर्धेश्चाविशे. पेण ग्रहणम् ॥
SR No.023387
Book TitleLaghu Ane Bruhat Prakrit Vyakaran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDalichand Pitambardas
PublisherDalichand Pitambardas
Publication Year1905
Total Pages574
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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