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________________ (५८) 49 अथ भी संघपट्टका - सिकि थशे माटे यज्ञ करनारने मांस नक्षणनी लालच मात्रने ज. पावनारी ने परलोकमां नरकपात करावना ने घणा धननो खरच ने महा प्रयास तेणे करीने साध्य पदार्थने जणावनारी पशु मार. का श्रुतिनुं शुं प्रयोजन ? टीकाः-नापिचतुर्थः ॥ यागादिविहितायां हिंसायाम: 'प्यहिंसाबुध्ध्युत्पादनेन रागादिमत्तयाऽनाप्तेष्वप्पाप्तबुझ्युत्पाद नेन च विपर्ययज्ञानजननात् ॥ तथा चोक्तं विप्रोत्तमेन परीक्षा पुरस्सरमन्युपेतजिनशासनेन श्रुतीनां परस्पर व्याहतार्थत्वा. दिक मीमांसमानेन प्रमाणिकचक्रचूमामणिना पमितधन पाखेन ॥ अर्थः-चोथो विकल्प पण घटतो नथी केमजे यज्ञादिकने विषे करेली जे हिंसा तेमां पण अहिंसा बुद्धिने उत्पन्न करनारी ए श्रति ले माटे.तथा पोतामा रहेला जे रागद्वेषादि दोष तेणे करीने अहितकारी एटले यज्ञने विषे हिंसाने कहेनार पुरुषो तेमने विषे हितकारी पणानी बुद्धि उत्पन्न करवा ते रूपो विपरीत ज्ञानने नुत्पन्न करवापणुं वेदमां रघु ने, ए हेतु माट ब्राह्मणमां श्रेष्ट परीक्षापूर्वक जिनशासननो अंगीकार ने श्रुतियोर्नु परस्पर विरुषार्थपणुं इत्यादि विचार करनार ने प्रमाणिक पुरुषना समूहनो मुकुटमणि समान पंकित धनपाल तेथे था प्रकारे कयुं . टीका--स्पर्शोऽमेध्यक्षुजां गवामघहो वंद्या विसंज्ञा पुमाः
SR No.023205
Book TitleSangh Pattak - 40 Kavyano Attyuttam Shikshamay Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvallabhsuri, Nemichandra Bhandagarik
PublisherJethalal Dalsukh Shravak
Publication Year1907
Total Pages704
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size16 MB
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