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________________ ४४२ कातन्त्रव्याकरणम् [समीक्षा] 'प्रस्ताव:' इत्यादि शब्दरूपों के सिद्ध्यर्थ दोनों ही व्याकरणों में घञ्' प्रत्यय किया गया है। पाणिनि का सूत्र है – “प्रे द्रुस्तुस्रुवः " (अ०३।३।२७)| अत: उभयत्र पूर्ण समानता है। - [ रूपसिद्धि] - घञ् सि। प्रस्तावः । प्र १३. प्रद्रावः । प्र द्रु स्तु घञ् प्रस्रावः । प्र + स्रु - घञ् - सि। 'प्र' उपसर्गपूर्वक 'द्रु-स्तु-स्रु' धातुओं से घञ् प्रत्यय, धातुघटित उकार की वृद्धि आव्- आदेश तथा विभक्तिकार्य । । ११८७ | ११८८. नियोऽवोदोः [४।५।१६] - + - सि। - [ सूत्रार्थ ] ‘अव - उद्’ उपसर्गों के उपपद में रहने पर ' णीञ् प्रापणे' (१।६००) धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय होता है।।११८८। [दु० वृ०] अवोदोरुपपदयोर्नियो घञ् भवति । अवनायः, उन्नायः । कथम् उन्नयः ? उद्गतो नयः उन्नयः, अप्यधिकाराद् वा ।। ११८८। [क० च० ] नियः। हेमकरमते ‘उन्नयः' इति, अप्यधिकाराद् वेति वृत्तौ पाठः । बहुपुस्तके तु 'उद्गतो नयः उन्नयः' इति वृत्तौ तु पाठो नास्य सम्मतः ।। ११८८ । [समीक्षा] 'उन्नाय:' इत्यादि शब्दों के सिद्ध्यर्थ दोनों ही आचार्यों ने 'घञ्' प्रत्यय का विधान किया है। पाणिनि का सूत्र है - " अवोदोर्नियः " (अ०३।३।२६) । अतः उभयत्र समानता है ।। ११८८। [रूपसिद्धि] १२. अवनायः । अव नी घञ् - सि। उन्नायः । उद् नी घञ् सि । 'अव उद्' उपसर्गों के उपपद में रहने पर ' णीञ् प्रापणे' (१।६००) धातु से 'घञ्' प्रत्यय, ‘घ् - ञ्’ अनुबन्धों का प्रयोगाभाव, इज्वद्भाव, धातुघटित ईकार की वृद्धि, ऐकार को 'आय्' आदेश तथा विभक्तिकार्य ।। ११८८। ११८९. निरभ्योः पूल्वोः [४।५।१७] [सूत्रार्थ] 'निर्- अभि' उपसर्गों के उपपद में रहने पर 'पूञ् पवने, लूञ् छेदने (८१८. ९) धातुओं में 'घञ्' प्रत्यय होता है ।। ११८९ ।
SR No.023091
Book TitleKatantra Vyakaranam Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJankiprasad Dwivedi
PublisherSampurnanand Sanskrit Vishva Vidyalay
Publication Year2005
Total Pages824
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size38 MB
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