SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 392
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३४६ कातन्त्रव्याकरणम् के ही अवशेष रहने की आवश्यकता होती है - आदि व्यञ्जन के रूप में ‘स्-श्' आदि की नहीं । एतदर्थ दोनों ही आचार्यों ने मुख्य सूत्र से भिन्न सूत्र बनाया है | पाणिनि का सूत्र है – “शपूर्वाः खयः" (अ० ७।४।६१)। [विशेष वचन] १. अनाद्यर्थोऽयमारम्भः (दु० वृ०)। २. 'शिटोऽघोषः' इति सिद्धे परग्रहणं सामीप्यषष्ठीशङ्कानिरासार्थम् (दु० टी०)। ३. (शिट्परः) तत्पुरुष एवायं न बहुव्रीहिः (दु० टी०)। ४. नैवम्, पूर्वं चकारस्याभिनिवृत्तस्य श्रुतिरशक्या निवर्तयितुम्, न्यायोऽ___ यमनित्यः, पितुरभावेऽपि पुत्रस्य दर्शनात् (दु० टी०)। ५. 'शिटः परः' इत्यनेन पञ्चमीलक्षणस्तत्पुरुष एवायम्, न तु शिट् परो यस्मादिति बहुव्रीहिरिति दर्शयति (वि० प०)। ६. उक्तमस्य व्याख्यानं तदसाम्प्रतम्, दुर्गवाक्येन विरोधात् (बि० टी०)। ७. शिक्षाश्रयणे प्रतिपत्तिगौरवं स्यादिति तदेतत् "कवर्गस्य चवर्गः'' (३।३।१३) इति सूत्रटीकायामुक्तम् (बि० टी०)। [रूपसिद्धि] १. चुश्च्योत | श्च्युत् + अट् (परोक्षा)। 'श्च्युतिर् क्षरणे' (१।५) धातु से परोक्षासंज्ञक परस्मैपद - प्रथमपुरुष – एकवचन अट् प्रत्यय, “चण्परोक्षाचेक्रीयितसनन्तेषु" (३।३।७) से धातु को द्विर्वचन, प्रकृत सूत्र से शकार - परवर्ती च की रक्षा -श् का लोप, "अभ्यासस्यादिळञ्जनमवशेष्यम्" (३।३।९) से 'यू-त्' व्यञ्जनों का लोप तथा "नामिनश्चोपधाया लघोः" (३।५।२) से उपधासंज्ञक उकार को गुणादेश । २. तिष्ठेव । ष्ठिव् + अट् । 'ष्ठिवु निरसने' (१।१९०;३।४) धातु से परोक्षासंज्ञक परस्मैपद-प्रथमपुरुष-एकवचन अट् प्रत्यय, “धात्वादेः षः सः" (३।८।२४) से ष् को स्, 'निमित्ताभावे नैमित्तिकस्याप्यभावः' (का० परि० २७) इस न्याय के अनुसार ए के निवृत्त हो जाने से तन्निमित्तक ठ का थ् के रूप में परिणत होना, 'स्थिव्' का द्विर्वचन, अभ्याससंज्ञा, 'थि' की रक्षा – 'स्व' का लोप “द्वितीयचतुर्थयोः प्रथमतृतीयौ" (३।३।११) से थ् को त्, “निमित्तात् प्रत्ययविकारागमस्थः सः
SR No.023089
Book TitleKatantra Vyakaranam Part 03 Khand 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJankiprasad Dwivedi
PublisherSampurnanand Sanskrit Vishva Vidyalay
Publication Year2000
Total Pages564
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size28 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy