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________________ संकटपर विजय / [85 जिससे कि सदा मल-मूत्रादि घृणित वस्तुयें बहती रहती हैं, निंद्य है, अपवित्रताकी साक्षात् खान है। तूने जिन भोगोपभोग वस्तुओंको कामियोंके लिए अच्छा बतलाया, बतला तो उनमें सार क्या है ? और कौन उनमें ऐसी खूबी है जो वे तृप्तिकी कारण कही जायँ ? उनका मुँह, जिसे कामी लोग चाहते हैं-चूमते हैं, लारादिसे युक्त है और सदा बदबू मारा करता है। उसका चूमना ऐसा है जैसा कुत्तेका मुर्दे और दुर्गन्धित शरीरको चाटना। जो विषय-लम्पटी लोग इस शरीर द्वारा भोगोंको भोगते हैं और उसमें आनन्द मानते हैं, यदि विचार कर देखा जाय तो यह शरीर सब अपवित्रताओंका घर है। जिसके नौ द्वारोंसे सदा मल-मूत्रादि दुर्गन्धित वस्तुयें बहती रहती हैं उस शरीरको भला ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो खिला-पिला कर पाले और वस्त्राभूषणों द्वारा सजावे / शरीर आत्माका शत्रु है और शत्रुको कितना ही पालापोसा जाय, पर अन्तमें होगा वह दुःखका कारण ही / यही हालत इस शरीरकी है / इसे कितना ही खिला-पिलाकर पुष्ट करो-कष्ट न देकर आराम दो, पर यह अपने स्वभावको न छोड़कर नाना भाँति रोगोंको उत्पन्न करेगा और कष्ट देगा तथा परलोकमें दुर्गतिमें पहुँचावेगा / इसलिए जो समझदार हैं-परलोक सुधारना चाहते हैं वे इस शरीरको तप द्वारा सुखाकर अपने मनुष्य जन्मको सार्थक करते हैं। जिन अनेक प्रकारके भोगोंको भोग कर भी कामी लोग जब तृप्त नहीं हुए तब उन नरकोंमें लेजानेवाले भोगोंसे सत्पुरुषको क्या लाभ? लोग तो यह समझते हैं कि विषय
SR No.022755
Book TitleSudarshan Charit
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdaylal Kashliwal
PublisherHindi Jain Sahitya Prasarak Karyalay
Publication Year
Total Pages52
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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