________________ ... सुदशनकी तपस्या। [ 71 वचनयोगको, जो अत्यन्त निंद्य और पापका कारण है, सत्यव्रत और मौनव्रत द्वारा रोकना चाहिए। यद्यपि उपदेश शुभ और अशुभ इन दोनों ही योगोंके छोड़नेका है; परन्तु धर्मोपदेश, ध्यान-सिद्धि आदिके लिए कभी कभी शुभ योग भी धारण किया जाता है। वह पुण्यके बढ़ानेका कारण है। रहा सात प्रकारका काययोग, सो वह पाप और अनर्थीका कारण-अशुभ है, इसलिए साधुओंको कायोत्सर्ग, ध्यान-अध्ययनादि द्वारा उसे नष्ट करना चाहिए / यहाँ जिन जिन संसारके बढ़ानेवाले कारणोंका उल्लेख किया गया, वे सब अनन्त दुःखोंके कारण हैं। उन्हें काले भयंकर सर्पकी तरह दूरहीसे छोड़देना चाहिए / तब ही कर्मोका आना रुक सकेगा और मोक्ष सुखका लाभ प्राप्त किया जा सकेगा। इन मिथ्यात्व, अविरत, प्रमाद, कषाय, योग आदिके रुकते ही कर्मोका आना रुक जायगा और कर्मोके रोकनेके लिए वैराग्यरूपी शस्त्रसे राग, द्वेष, मोह आदि शत्रुओंको नष्ट कर मुनिपद स्वीकार करना चाहिए। ___इस प्रकारके विचारोंसे सुदर्शनका वैराग्य बहुत ही बढ़ गया / वह फिर स्त्री-पुत्र, भाई-बन्धु, धन-दौलत, सुख-वैभव, तथा दस प्रकार बाह्य परिग्रह और मिथ्यात्व, राग, द्वेष आदि चौदह अन्तरंग परिग्रह-आत्म-शत्रु, इन सबको छोड़कर निःशल्य-चिन्तारहित हो गया। इसके बाद वह श्रीविमलवाहन मुनिराजके पास आया और उन्हें अपना दीक्षा-गुरु बना उसने नमस्कार किया। फिर उनके कहे अनुसार शुद्ध मनसे यह संकल्प कर, कि-'सारे संसारके