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________________ 68] सुदर्शन-चरित। रस्सीसे खूब मजबूत बाँधकर तपःक्लेशरूपी कैदखानेमें डाल देते हैं। फिर वे इनको कुछ हानि नहीं पहुंचा सकते / और जो वेचारे इन महान् धूर्तीके फन्देमें फँस जाते हैं, उनकी सब विवेक-बुद्धि नष्ट हो जाती है। फिर वे स्त्रियोंके साथ विषय-भोगोंमें, जो अनन्त दुःखोंके देनेवाले हैं, सुख देखने लगते हैं। पर असलमें ये विषय-भोग बड़े दुष्ट हैं, धूर्त हैं और संसारको धोखेमें डालनेवाले हैं। इसलिए मुमुक्षुओंको चाहिए कि वे व्रत-धर्मरूपी तलवारसे शत्रुओंकी भाँति इन्हें नष्ट करनेका यत्न करें / जो जड़ हैं-जिन्हें हिताहितका ज्ञान नहीं, वे ही इन पापके समुद्र, अशुभ, और अन्तमें अत्यन्त तीव्र दुःखके देनेवाले और दुःखके मूल कारण विषय-भोगोंको भोगते हैं। जिन विषयोंको पशु म्लेच्छ आदि भोगते हैं उन्हें बुद्धिमान् लोग कैसे अच्छे समझें / उनमें सिवा अपने और स्त्रियोंके शरीर नष्ट होने, शक्ति नष्ट होने और दुःख होनेके, कुछ लाभ नहीं। इन विषयोंका सेवन तो किया जाता है काम-शान्तिके लिए, पर ज्यों ज्यों वे भोगे जाते हैं त्यों त्यों कामाग्नि शान्त न होकर उल्टी अधिक अधिक बढ़ती जाती है / तब बुद्धिमानोंको यह समझकर, कि ये विषय सर्व अनर्थों के करनेवाले और बड़े दुष्ट हैं, इनके छोड़नेका यत्न करना चाहिए / जैसे कि रोगके मिटानेका यत्न किया जाता है / जिस संसारमें सुख समझकर विषयी मूर्ख लोग शरीर द्वारा विषयोंका सेवन करते हैं, वह संसार महानिंद्य है, तमाम अपवित्रताओंका स्थान है। और यह शरीर भी महा बुरा है, एक गिरी-पड़ी झोंपड़ीके समान है।
SR No.022755
Book TitleSudarshan Charit
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdaylal Kashliwal
PublisherHindi Jain Sahitya Prasarak Karyalay
Publication Year
Total Pages52
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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