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________________ अष्टमो लम्बः । विलक्षण सन्मान होते देखनेसे ( सखीन् ) मित्रों पर अत्यन्त (समशेत ) संदेह किया । अत्र नीतिः (हि) निश्चयसे (विशेषज्ञः) विशेषताका पहचाननेवाला बुद्धिमान् (विशेषाकारवीक्षण त् ) विशेष आकृतियोंके देखनेसे (विशेते) संदेह करने लगता है ॥३४॥ रहस्येव वयस्येषु तन्निदानमचोदयत् । एककण्ठेषु जाता हि बन्धुता ह्यवतिष्ठते ॥ ३५॥ ___अन्वयार्थ:--(रहसि) एकान्तमें जीवंधर स्वामीने (वयस्येषु) मित्रोंसे ( तन्निदानं ) इसका कारण ( अचोदयत् ) पूछा । अत्र नीतिः । ( हि ) निश्चयसे ( एककण्ठेषु ) एकसे अभिप्राय वाले बन्धुओंमें (जाता) उत्पन्न हुई (बन्धुता) मित्रता ही (अवतिष्ठते) स्थिर रहती है ॥ ३५ ॥ मुख्यं सख्यं गतस्तेषामाचख्यौ पङ्कजाननः । सजनानां हि शैलीयं सक्रमारम्भशालिता ॥ ३६॥ ____ अन्वयार्थः---(तेषां) उनमें से (मुख्यं सख्य) प्रधान मित्रताको (गतः) प्राप्त (पङ्कनाननः) पद्मास्य नामका मित्र ( आचख्यौः ) बोला । अत्र नीतिः । (हि) निश्चयसे ( सक्रमारम्भशालिता ) क्रम पूर्वक किसी कार्यका आरंभ करना (इयं) यह (सज्जनानां शैली) सजन पुरुषोंकी पद्धति है ॥ ३६ ॥ स्वामिन्स्वामिवियोगेऽपि युक्ता दग्धासुभिर्वयम् । अस्तोकभाविभाग्येन हस्तग्राहं ग्रहादिव ॥ ३७॥ __अन्वयार्थः-(हे स्वामिन् ! ) हे स्वामी ! ( स्वामिवियोगे) आपके वियोग होने पर (दग्धासुभिः वयम् ) जले हुए प्राणोंसे युक्त भी हम लोग ( अस्तोकमावि भाग्येन ) भाविमें उदय होने
SR No.022644
Book TitleKshatrachudamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNiddhamal Maittal
PublisherNiddhamal Maittal
Publication Year1921
Total Pages296
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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