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________________ उत्तराध्ययन सत्र. Pananer बहिया उट्ठमादाय, णावकंखे कयाइ वि; पुव्वकम्मखयट्ठाए, इमं देहं समुद्धरे ॥१३॥ विविच्च कम्मुणो हेडं, कालकंखी परिव्वए; माय पिण्डस्स पाणस्स, कडं लक्ष्ण भक्खए ॥१४॥ सण्णिहिं च ण कुवेजा, लेवमायाए संजए; पक्खी पत्तं समादाय, णिरवेक्खो परिवए ॥१५॥ एसणासमिओ लज्जू, गामे अणियओ चरे; अप्पमत्तो पमत्तेहिं, पिण्डवायं गवेसए ॥१६॥ एवं से उदाहु अणुत्तरनाणी अणुत्तरदंसी अणुत्तरणाणदंसणधरे अरह णायपुत्ते भगवं वेसालिए वियाहिए॥त्ति बेमि॥ ॥8 खुड्डागनियण्ठिजमज्झयणं समत्तं ॥६॥ बहिरूप्रमादाय नावकाक्षेत् कदाचिदपि । पूर्वकर्मक्षयार्थायेम देहं समुद्धरेत् ॥१३॥ विविव्य कर्मणो हेतु कालकाङ्क्षी परिव्रजेः । मात्रां 'पण्डस्य पानस्य कृतं लब्ध्वा भक्षयेत् ॥१४॥ निधि च न कुर्वीत लेपमात्रया संयतः । पक्क्षी (व) पत्रं समादाय निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥१५॥ एपणासमितो लज्जावान् ग्रामेनियतश्चरेत् । अप्रमतः प्रमत्तेभ्यो पिण्डपातं गवेषयेत् ॥१६॥ एवं स उदाहुतवान् अनुत्तरज्ञान्यनुत्तरज्ञानदर्शनघरः अर्हन् ज्ञातपुत्रो भगवान् वैशालिको व्याख्याता ॥ इति ब्रवीमि ॥६॥ शुल्लकनिर्ग्रन्थीयाख्यमध्ययनं समाप्तम् ॥
SR No.022588
Book TitleUttaradhyayanani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSuryodaysagarsuri, Narendrasagarsuri
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1992
Total Pages330
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size32 MB
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