SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 261
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २४८ .... अध्ययन ३२ भावाणुगासाणुगए य जीवे, चराचरे हिंसइ गरूवे । चित्तेहिं ते परितावेइ बाले, पीलेइ अत्तट्ठगुरू किलिट्टे ॥९२॥ भावाणुवाएण परिग्गहेण, उप्पायणे रक्षण-सण्णिओगे । वए विओगे य कहिं सुहं से, संभोगकाले य अतित्तलाभे ॥१३॥ भावे अतित्ते य परिग्गहे य, सत्तोवसत्तो ण उवेइ तुहि । अतुट्ठिदोसेण दही परस्स, लोभाविले आययई अदत्तं ॥९४॥ तण्हाभिभूयस्स अदत्तहारिणी, भावे अतित्तस्स परिग्गहे य । मायामुसं वइढइ लोभदोसा, तत्थावि दुक्खा ण विमुच्चई से ॥१५॥ मोसस्स पच्छा य पुरत्थओ य, पओगकाले य दुही दुरंते । एवं अदत्ताणि समाययंतो, भावे अतितो दुहिओ अणिस्सो ॥९६॥ भावाणुरत्तस्स परस्स एयं, कत्तो सुहं होज कयाइ किंचि? । तत्थावभोगे वि किलेसदुखं, णिवत्तई जस्स कए ण दुक्खं ॥९७॥ एमेव भावम्मि गओ पओसं, उवेइ दुखोघपरंपराओ । पदुट्ठचित्तो य चिणाइ कम्मं, जं से पुणो हाइ दुहं विवागे ॥९॥ भावानुगा ॥९२।। भावानु ॥९३।। भावे ॥९४॥ भावे ॥९५॥ भावे ॥१६॥ भावानु ॥९७॥ भावे ॥९८॥
SR No.022588
Book TitleUttaradhyayanani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSuryodaysagarsuri, Narendrasagarsuri
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1992
Total Pages330
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size32 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy