SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 260
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २४७ उत्तराध्ययन सूत्र. กกกกกกกกก एमेव फासम्मि गओ पओसं, उवेइ दुक्खोघपरंपराओ । पदुट्ठचित्तो य चिणाइ कम्म, जं से पुणो होइ दुहं विवागे ॥८५॥ फासे विरत्तो मणुओ विसोगो, एएण दुक्खोघपरंपरेण । ण लिप्पए भवमझे वि सन्तो, जलेण वा पुखरिणीपलासं ॥८६।। मणस्स भावं गहणं वयंति, तं रागहेउं तु मणुष्णमाहु । तं दोसहेउं अमणुमणमाहु, समो उ जो तेसु स वीयरागो ॥७॥ भावस्स मणं गहणं वयंति, मणस्स भावं गहणं वति । रागस्स हेउं समणुण्णमाहु, दोसस्स हेउं अमणुण्णमाहु ॥८॥ भावेसु जो गिद्धिमुबेइ तिव्वं, अकालियं पावइ से विणासं । रागाउरे कामगुणेसु गिद्धे; करेणुमग्गाऽवहिए व्व नागे ॥८९॥ जे यावि दोसं समुवेइ तिचं, तस्सि खणे से ऊ उबेइ दुक्खं । दुइंतदोसेण सगण जन्तू, ण किंचि भावं अवरज्झई से ॥९०॥ एगंतरत्ते रुइरंसि भावे, अतालिसे से कुणई पसं । दुक्खस्स संपीलमुवेइ वाले, ण लिप्पई तेण मुणी विरागो ॥९१॥ स्पर्श ॥८५।। स्पर्श ॥८६॥ मनसो भावं ॥८७॥ भावस्य मनो, मनसो भावं ॥८८॥ भाषेषु । रागातुरः कामगुणेषु गृद्धः, करेणुमार्गापहत इव नागः ॥८९॥ भावो ॥१०॥ भावे ॥९१॥
SR No.022588
Book TitleUttaradhyayanani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSuryodaysagarsuri, Narendrasagarsuri
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1992
Total Pages330
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size32 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy