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तो अन्याय को देखकर महसूस करके भी जीवित रहता है । अतः मैं कहता हूँ, वह सहिष्णु ही होगा।"
पूर्वोक्त सभी कथनों को सुनकर कुत्ता बोला-'जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि' यह सर्वमान्य सिद्धान्त है और सत्य भी यही है। यदि ऐसा न हो तो सभी विचित्र भावना से भावित होकर वर्णन करने में समर्थ कैसे होते ? मैं आपसे पूछता हूँ कि भगवान को केशावली क्यों होनी चाहिए ? क्या यही पराक्रम की निशानी है ? केशावली तो अश्व, गर्दभ आदि के भी होती ही है। पीले तथा काले रंग की धारियों की परमात्मा को क्या आवश्यकता ? इनकी सार्थकता प्रतीत नहीं होती। मुखाकृति भी शरीर के प्रमाण के अनुसार सुशोभित होती है। ईश्वर का इधरउधर दौड़ना-भागना भी कहाँ सार्थक प्रतीत होता है ? वह तो सर्वव्यापक है। क्या आवश्यकता है, उसे द्रविड़ प्राणायामवत् व्यर्थ प्रयास की ? भगवान यदि अतीव सहिष्णु, सरल हृदय होकर विश्व को देखता है तो भला विश्व की रक्षा कौन करेगा? इसलिए मैं कहता हूँ कि "ईश्वर अल्प निद्रावान, जागृतिमय, स्फूतिमान ही है,
जगत्कर्तृत्व-मीमांसा-२०